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भीलवाड़ा

भाभियों ने बरसाए कोड़े, कड़ाह से रंग डालते रहे देवर

बरसते कोड़ों के बीच कड़ाह से भरी रंगीन पानी की डोलचीकोड़ामार होली : 200 साल की परंपरा, जीनगर समाज ने तेरस पर खेले रंग, देखने उमड़े भीलवाड़ावासी

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भीलवाड़ा. शहर का सर्राफा बाजार रविवार को रंगतेरस पर 200 साल पुरानी परंपरा का गवाह बना। जीनगर समाज समिति के तत्वावधान में कोड़ामार होली खेली गई। इसमें रंग से भरी कड़ाह के चारों ओर जीनगर समाज की महिलाएं कपड़े के कोड़े लेकर खड़ी थी। वहीं समाज के पुरुषों को इस कड़ाह से रंगीन पानी की डोलची भरनी थी, ताकि महिलाओं पर बौछारें मार सके।

 

महिलाएं जहां कड़ाह की सुरक्षा कर रही थी तो पुरुषों का झुंड रंगीन पानी चुराने की कोशिश कर रहा था। महिलाओं व पुरुषों के बीच कश्मकश को देखने बड़ी संख्या में भीलवाड़ावासी जुटे। करीब तीन घंटे चली कोड़ामार होली के दौरान कई बार कड़ाह भरा गया। इस दौरान क्षेत्र की दुकानें बंद रहीं। इससे पहले शहर के सर्राफा बाजार में बड़े मंदिर के पास जिले भर के जीनगर समाज के लोग एकत्र हुए। पुलिस ने भी पुख्ता इंतजाम कर रखे थे। ड्रोन से नजर रखी गई।
खेल के पीछे छुपा संदेश

जीनगर समाज के अध्यक्ष कैलाश जीनगर ने बताया कि मेवाड़ की दो सदी पुरानी परंपरा में केवल जीनगर समाज के पुरुष-महिलाएं ही भाग लेती हैं। कोड़ामार होली धुलंडी के 13वें दिन रंगतेरस को खेली जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य महिला सशक्तिकरण और देवर-भाभी के अटूट रिश्ते को दर्शाना है। जिले भर से समाज की महिलाएं ढोल नगाड़ों के साथ सर्राफा बाजार पहुंची। समाज के बंधुओं ने हंसी- ठिठोली से स्वागत किया। पुरुष या देवर कड़ाव में भरा रंग महिला या भाभियों पर डालते हैं। महिलाएं उनसे बचने के लिए कपड़े से बने कोड़े मारती है।