
The remains of Harappa, Mohenjodaro and Sindhughati civilization were
जसराज ओझा.बागोर. जिला मुख्यालय ( bhilwara )से ३० किलोमीटर दूर बागोर (bagore )कस्बे की पहचान एेतिहासिक है लेकिन अब देखरेख के अभाव मे यह पहचान खो रहा है। 5000 ईसा पूर्व हड़प्पा मोहनजोदड़ो की सभ्यता के लिए प्रसिद्ध बागोर कस्बा इन दिनों पुरातन कालीन सभ्यता को भी धीरे-धीरे खो रहा है। बागोर कस्बा कोठारी नदी के किनारे बसा हुआ है। इस कोठारी नदी पर महासतिया के पास हड़प्पा मोहनजोदड़ो की 5000 ईसा पूर्व सभ्यता विकसित हुई थी। उस सभ्यता के लिए बागोर कस्बा आज भी इतिहास में लिखा जाता है लेकिन इस सभ्यता को अनदेखा करने से धीरे धीरे लुप्तप्राय हो रही है। कुछ समय पूर्व डेकोन कॉलेज पूना महाराष्ट्र के छात्र-छात्रा प्रतिवर्ष बागोर कस्बे में महासतीया एनीकट पर पुरातन कालीन हड़प्पा मोहनजोदड़ो, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष तलाशने आते थे। साथ ही अपने छोटे-छोटे औजारों से पुरातन कालीन सभ्यता के अवशेष मिट्टी के बर्तन, लकड़ी के औजार, पत्थरों के औजार वह हड्डियों के टुकड़े अपने साथ ले गए हैं।वैसे बागोर कस्बा हड़प्पा मोहनजोदड़ो की सभ्यता के साथ ही सेवा व सिमरन के लिए भी जाना जाता है। सेवा सिमरन में सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने बागोर में 17 दिन प्रवास किया था तथा तत्कालीन महाराजा का राजतिलक भी किया था। बागोर से अब तक कई महाराजा उदयपुर मेवाड़ की राजगद्दी पर भी आसीन हुए थे। वहां बागोर की हवेली भी बनी हुई है। किदवंती है कि पांडवों ने यहां बक्सासुर राक्षस का वध किया था। भीम ने राक्षस को मारने के बाद यहां के धर्म तालाब में हाथ धोए थे। इस कारण पानी का रंग अब भी बदला हुआ ही रहता है।
Published on:
29 Oct 2019 11:32 am
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