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inside story of Bhilwara यह है भीलवाड़ा की अंदर की बात

This is the inside story of Bhilwara भीलवाड़ा। यह अनदेखी है या किसी को पिछले रास्ते से लाभ पहुंचाने की कोशिश। खातेदार को रास्ता देने के लिए अधिकारियों ने नहर पर ही पुलिया बना दी। सब कुछ गुपचुप हुआ, लेकिन अवैध कब्जे तो आंखों में खटकते हैं, कुछ को जानकारी हुई तो वह मामले को दबा भी गए, लेकिन शिकायत आलाकमान तक पहुंची तो फिर कार्रवाई होनी ही थी।

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This is the inside story of Bhilwara नरेन्द्र वर्मा. भीलवाड़ा। यह अनदेखी है या किसी को पिछले रास्ते से लाभ पहुंचाने की कोशिश। खातेदार को रास्ता देने के लिए अधिकारियों ने नहर पर ही पुलिया बना दी। सब कुछ गुपचुप हुआ, लेकिन अवैध कब्जे तो आंखों में खटकते हैं, कुछ को जानकारी हुई तो वह मामले को दबा भी गए, लेकिन शिकायत आलाकमान तक पहुंची तो फिर कार्रवाई होनी ही थी। मामला नगर विकास न्यास की जमीन से जुड़ा एवं आला के खुद प्रशासक होने से उन्होंने गंभीरता से लिया। लेडी सिंघम को मय जाप्ता भेजा, कुछ ही देर में बुलडोजर ने कब्जे में फंसी नहर की राह फिर खोल दी। मामला अब जांच में है, इस कार्यवाही से कुछ को तकलीफ हुई, लेकिन पांसल क्षेत्र की जनता खुश है।

यह नहीं थके, कर रहे घंटों काम This is the inside story of Bhilwara

गत एक पखवाड़े की शहर एवं जिले की शांति एवं कानून व्यवस्था तथा प्रशासनिक क्षमताओं का आंकलन करे तो यहां भी महिला अधिकारियों की महिला शक्ति का ही बोलबोला दिखा। कोरोना से मुक्ति के बाद शहर एवं जिले में आयोजनों के प्रति जोश है। उससे अधिकारियों की मशक्कत बढ़ गई है। चर्चा है कि इस दौरान महिला अधिकारी जो जज्बा दिखा रही है , उसे क्षेत्र की जनता के साथ आला अधिकारी भी कायल है। इनमें कई चेहरे तो जनता के बीच में खास है। इनमें लेडी सिंघम के रूप में उन्होंने कोरोना संकट में छाप छोड़ी वह अभी भी उपखंड कार्यालय के साथ ही शहर की शांति एवं कानून व्यवस्था में बरकरार दिखी। कार्य कुशलता एवं प्रबंधन में खाकी में जिले की दोनों एएसपी, गांवों की सरकार में सीईओ, नगर नियोजन में आयुक्त व ओएसडी तथा मांडल से लेकर हुरड़ा तक में एसडीओ के नाम भी खासी चर्चा में है।

अब जाग रहे
योजनाएं तो बनती व बिगड़ती है, लेकिन हाथ में आई कोई योजना निकल जाए तो फिर तकलीफ होती है। टेक्सटाइल पार्क भी यही दर्द दे रहा है। आम जन से लेकर उद्योग जगत ने बड़ी उम्मीद पार्क से लगा रखी थी, लेकिन यह पार्क भी अब हाथ से फिसलता ही नजर आ रहा है। समय रहते कोई नहीं चेता और ना ही पूरा दमखम दिखाया, जो जोर अब लग रहा है, जब चिडिय़ा ही चुग गई खेत। चर्चा है कि यह जोर पहले ही लग जाता तो आज कहानी बदली हुई होती।


मेडिसिटी पर फिर संकट के बादल

मेडिसिटी योजना एक मायने में बड़ी योजना है। यह कह सकते है कि भविष्य में एक ही छत के नीचे मेडिकल कॉलेज, चिकित्सालय व क्लिनिक के साथ ही चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी कई सुविधाएं जुट सकती है। भीलवाड़ा समिट में भी मेडिसिटी योजना को प्रमुखता से प्रचारित किया गया, दस हजार करोड़ के निवेश कर्ताओं को भी मेडिसिटी योजना का आइना दिखाया गया, लेकिन खुसरफुसर यह है कि मेडिसिटी योजना को ही अब फिर से फाइल में बंद किया जा रहा है। आला अधिकारी व बड़े नेताओं को यह योजना अब रास नहीं आ रही है। यह दलील दी जा रही है कि वस्त्रनगरी पहले से ही मेडिकल हब है और खास कर अस्थि रोग का इलाज कराने के लिए प्रदेश के कई हिस्सों से लोग यहां आ रहे है। ऐसे में आजादनगर में बेशकीमती जमीन पर मेडिसिटी का दांव खेलना अब उचित नहीं है। मेडिसिटी का भविष्य क्या होगा यह तो राम ही जाने, लेकिन मेडिसिटी को लेकर शहर के बड़े नेताजी पहले ही विरोध दर्ज करा चुके है।


सदस्यता अभियान या व्यक्तिगत टीम

नए सदस्य बनेंगे और पुराने मजबूती से जुड़े रहेंगे तो संगठन मजबूत होगा, संगठन की मजबूती के लिए सत्ता पक्ष के बड़े नेता यह कर भी रहे है, बैठकों व भाषणों में उनका पूरा फोकस यही है कि अधिक से अधिक सदस्य बनाए जाए, लेकिन कहने, करने व करवाने में बड़ा फर्क है, यही सब कुछ अब साफ भी नजर आ रहा है। चर्चा है कि डिजिटल सदस्यता के लिए कोई राशि देय नहीं होने के बावजूद जो उत्साह दिखना चाहिए वह नजर नहीं आ रहा है, वरिष्ठ तो दबी जुबान में अब यह भी कहने लगे है कि संगठन की बजाए अब व्यक्तिगत टीम बनाने की भावना पनपने लगी है, जो संगठन के लिए ठीक नहीं है।