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This is the inside story of Bhilwara यह है भीलवाड़ा की अंदर की बात

  his is the inside story of Bhilwara गुुरुजी से खाकी वर्दी में आए बड़े अधिकारी जनता से सामंजस्य करना शायद नहीं सीख सके। नतीजा बेवक्त में शहर से विदाई हो गई। कहा जा रहा है कि संवेदनशील शहर के साथ पग-पग पर चुनौती हो तो हर कदम सोच समझ कर रखना पड़ता है, लेकिन वे ऐसे घिरे की उबर ही नहीं पाए, जब संभले तो बहुत देर हो चुकी थी।
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भीलवाड़ा

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Narendra Kumar Verma

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Updated: 31 May 2022, 12:44 PM IST

यह है भीलवाड़ा की अंदर की बात

यह है भीलवाड़ा की अंदर की बात

- नरेन्द्र वर्मा. गुुरुजी से खाकी वर्दी में आए बड़े अधिकारी जनता से सामंजस्य करना शायद नहीं सीख सके। नतीजा बेवक्त में शहर से विदाई हो गई। कहा जा रहा है कि संवेदनशील शहर के साथ पग-पग पर चुनौती हो तो हर कदम सोच समझ कर रखना पड़ता है, लेकिन वे ऐसे घिरे की उबर ही नहीं पाए, जब संभले तो बहुत देर हो चुकी थी।

फाइल ही ना जाने कहां गई

एसीबी से यूआईटी को मुक्ति नहीं मिली है। जो हालात बने हुए है, उससे मुक्ति आसान भी नजर नहीं आ रही है। एसीबी अब नया समेलिया में सड़क निर्माण को लेकर हुए घपले का पुराना हिसाब मांग रही है। एसीबी ने तलब किया तो संबंधित शाखा के अधिकारी बगलें झांक रहे है। उनका घूम फि र कर यही जवाब सामने आ रहा है कि हम तो नए लगे हैं, जिन्होंने किया, वे अब यहां रहे ही नहीं। भला एसीबी कहां मानने वाली है। टीम के अधिकारी का भी सीधा जवाब है कि अधिकारी नहीं रहे तो क्या हुआ फ ाइलें तो यही हैं, संबंधित बाबूजी तो यही हैए चर्चा है कि संबंधित फाइलें तो पहले ही गायब हो चुकी है, डुप्लीकेट दस्तावेजों में अब कोई दम ही नहीं रहा।

पगार का मामला है

पगार ही समय पर नहीं मिले तो फि र काम में मन कैसे लगे। जिला पूल का एक चालक भी इससे नाराज हो गया। पगार हाथ में नहीं आई तो अपने साहब को सूचना दिए बिना काम से गोत मार गया। जीप से मोटरसाइकिल पर आए साहेब भी चार दिन में परेशान हो गए। शुक्र है कि बड़े हाकम ने इसे गंभीरता से लिया। जब नौकरी जाने का संकट आया तो चालक लौट भी आया। चर्चा है कि पगार घर पर भी नहीं पहुंचने से ड्राईवर के ही परिजन खासे परेशान थे। उन्होंने एडीएम को शिकायत की तो यह जांच बैठ गई कि आखिर पगार कहां जा रही है। ऐसे में पगार ही रूक गई।

यह प्रेशर की राजनीति

कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव को लेकर राजनीति गहराई हुई है। खासकर जिलाध्यक्ष कुर्सी तो केन्द्र व प्रदेश के बीच रस्साकसी में फं स गई है। डीआरओ केन्द्रीय नेतृत्व की पसंद तो बीआरओ के लिए प्रदेश के ही शीर्ष नेता की सिफ ारिश मानी जा रही है। संभवत यही कारण है कि बीआरओ के रूप में राजसमंद व उदयपुर के वरिष्ठ नेता जिले में संगठनात्मक चुनाव को लेकर मंथन कर रहे है। चर्चा है कि बीआरओ की नियुक्ति भी मांडलगढ़ की राजनीति से जुड़ी हुई है।