नरेन्द्र वर्मा। सत्ता पर पड़ गए भारी.....चिंतन एवं मनन जरूरी है। चिंतन एवं मनन में जिनकी मौजूदगी जरूरी हो यदि वह ही नहीं आए तो ऐसे चिंतन मनन का औचित्य ही नहीं है। जिला मुख्यालय पर सत्ताधारी संगठन एवं विपक्ष के वरिष्ठों ने अपने ही स्तर पर श्रम दिवस पर बड़े आयोजन किए। एक ने रक्तदान दिवस कर ताकत दिखाई तो दूसरे ने श्रमिक हितों पर चिंतन व मनन के बहाने पार्टी के वरिष्ठों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। परिणाम राजनीतिक गलियारे में चौंकाने वाले ही रहे। चिंतन मनन के लिए पार्टी का वरिष्ठ नेता कोई नहीं पहुंचा। लेकिन यही वरिष्ठ व बड़े नेता रक्तदान शिविर में उत्साह बढ़ाते जरूर नजर आए। इसकी खासी चर्चा हुई। आरोप प्रत्यारोप हुए तो समर्थकों ने बड़े नेताओं की पैरवी की। वे बोले कि वह तो जनता के बीच ही है। इधर, शिविर आयोजक इस बात से बड़े खुश थे कि चाहे विपक्षी पार्टी का लेबल उन पर लगा था, लेकिन नेताजी तो अपने ही है।