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यह अभागे, अब किसी घर में कान्हा तो कही राधा है

अपनों ने ठुकराया, परायों ने गले लगाया। ऐसे कई बच्चे सभ्रांत घरों में कान्हा व राधा बन कर खेल रहे है। वीरानें, झाडियों व पालने में मिले यह अभागे अब किस्मत के धनी है और कई परिवारों का चिराग बन कर खुशियां बिखेर रहे है।
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भीलवाड़ा

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Narendra Kumar Verma

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Updated: 30 Aug 2021, 11:53 AM IST

This unfortunate now Kanha in some house is Radha somewhere

This unfortunate now Kanha in some house is Radha somewhere

भीलवाड़ा। अपनों ने ठुकराया, परायों ने गले लगाया। ऐसे कई बच्चे सभ्रांत घरों में कान्हा व राधा बन कर खेल रहे है। वीरानें, झाडियों व पालने में मिले यह अभागे अब किस्मत के धनी है और कई परिवारों का चिराग बन कर खुशियां बिखेर रहे है। कुछेक बच्चे अभी बाल अधिकारिता विभाग के पालना व आंगन को अपनी किलकारियों से रोशन किए हुए है।

जिले में निष्ठुर हाथों ने ममता का आंचल बिछाने के बजाए कईयों का बचपन छीन लिया है। ऐसे बदनसीबों की तकदीर भले ही जन्म पर धोखा दे गई। लेकिन यह बच्चे अब अभागे नहीं रहे हैं। इनकी किस्मत बदल चुकी है। इनमें से कई आज संभ्रात परिवारों के राज दुलारे है। परिजनों के ठुकराए बच्चों में कई महानगरों में किसी घराने में किसी के चिराग बने है। वही कई बच्चे ऐसे है जिन्हें गोद लेने के लिए बड़ी संख्या में बाल अधिकारिता विभाग एवं बाल कल्याण समिति को आवेदन मिल रहे है।

दिल पसीज उठे

गत दो साल में ऐसे कुछेक मामले सामने आए जब नवजातों को कंटीली झांडियों में देख कर लोगों के दिल पसीज गए, निष्ठुर मां ने अपने कलेजे के टुकड़ों को सीने से लगा कर पालने की बजाए उन्हें कचरे के ढेर, झाडियों, नाले व वीरानें में फैंक दिया या फिर एमसीएच के पालना में छोड़ दिया। इनमें से कई घंटों क्या कई दिनों तक जिन्दगी और मौत से भी लड़ते रहे। कुछ नवजात ये जंग हार गए और काल के ग्रास बन गए, लेकिन इनमेंं कई नवजात ऐसे थे, जिनके लिए महात्मा गांधी चिकित्सालय का शिशु वार्ड पालना बना और यहां का नर्सिग स्टाफ ममतातयी मां, यहां इतना दुलार मिला की ये सभी बच्चे स्वस्थ्य है।

जीवनदायनी संभाले हुए है

यहां इन अभागों को राधा, कान्हा, शरद, अमन,राघव, रविशा, फाल्गुनी , शैलेश एवं धोनी के नाम से पहचान भी मिली है। इसके बाद शिशु गृह की जीवनदायनी (आयाओं) ने जिम्मेदारी संभाली और उनकी उंगली पकड़ कर अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया

इन्हें छोड़ गए निष्ठुर हाथ

महात्मा गांधी चिकित्सालय परिसर स्थित मातृ एवं शिशु चिकित्सालय के पालना घर में 3 मार्च 2021 को राधा को दो अज्ञात महिलाएं छोड़ गई। 13 जून 21 को भी अमन इसी पालना में मिला। इसी प्रकार
रविशा को 19 जनवरी2020 को कोई अज्ञात छोड़ गया था, इसी पालना में फाल्गुनी को भी 9 मार्च 2020 को कोई अज्ञात छोड़ गया था, तिलस्वां के केरखेड़ा में 7 फरवरी 2020 को राघव झाडियों में लावारिस मिला था। इसी प्रकार 31 अक्टूबर 2020 को पालना में शरद पूर्णिमा पर शरद मिला, 2 नवम्बर को इसी पालना में शैलेश मिला, 26 दिसम्बर 2020 को पालना में आई नवजात बालिका का नाम धोनी मिला।

गोद लेना आसान नहीं

केन्द्रीय दत्तक ग्रहण एजेंसी नई दिल्ली के जरिए गोद देने की तमाम प्रक्रिया होती है , गोद देने से पहले जिला बाल संरक्षण इकाई सभी प्रकार की विधिक पालना पूरी करती है। शिशु गृह में पल रहे बच्चों की गोद देने की भी कड़ी शर्ते है।

वीरानें में नहीं, पालना में छोड़े
बच्चें घर के नौनिहाल होते है, चाहे वह किसी की कोख से जन्में और कही पर इनका लालन पालन हो, लेकिन बच्चों को त्यागनें वालों को चाहिए कि वह निष्ठुरता नहीं दिखाएं। जरुरत किसी को नहीं है तो वो जंगल या खुले में नहीं फेंके, पालना गृह में छोड़ जाए, ताकि वो सुरक्षित रह सकें, ऐसे बच्चे अब अभागे नहीं रहे है। खुले में छोडऩे से कानूनी जटिलता बढ़ जाती है, जबकि पालना गृह में छोडऩे से पुलिस कार्रवाई से बचा जा सकता है।
डॉ. राजेश छापरवाल, सदस्य बाल कल्याण समिति, भीलवाड़ा