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शीतलाष्टमी पर भीलवाड़ा में अनूठी परम्परा: जिंदा शख्स की निकालते हैं अंतिम यात्रा

- पुराना भीलवाड़ा पहुंच अर्थी से उठ भाग जाता है युवक - होलिका के मंगेतर ईलाजी की याद में 200 साल से निकाल रहे अंतिम यात्रा - शहर होता है गुलाल-अबीर से सरोबार

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शीतलाष्टमी पर भीलवाड़ा में अनूठी परम्परा: जिंदा शख्स की निकालते हैं अंतिम यात्रा

शीतलाष्टमी पर भीलवाड़ा में अनूठी परम्परा: जिंदा शख्स की निकालते हैं अंतिम यात्रा

होली से सात दिन बाद भीलवाड़ा में अनूठी परम्परा निभाने का रिवाज है। यहां शीतलाष्टमी पर मुर्दे की सवारी निकाली जाती है। शवयात्रा में कोई मृत व्यक्ति अर्थी में नहीं जाता बल्कि जीवित को अर्थी पर लेटाकर अंतिम यात्रा निकाली जाती है। यात्रा शहर के मुख्य मार्गों से होते पुराना भीलवाड़ा इलाके में पहुंचती है। यहां अर्थी को जला दिया जाता जबकि उससे सोया व्यक्ति भाग जाता है। करीब दो सौ साल से परम्परा चली आ रही है। इस दौरान शहर गुलाल-अबीर से सरोबार होता है। होलिका के मंगेतर ईलाजी की याद में उनकी डोल (सवारी) निकालने की परंपरा है।

ढोल-नगाड़ों की गूंज, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
शव यात्रा में हजारों लोग शामिल होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस व प्रशासन पुख्ता इंतजाम करता है। ड्रोन से यात्रा पर नजर रखी जाती है। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी यात्रा के साथ चलते हैं। ढोल-नगाड़े के साथ गुलाल उड़ाते हुए शव यात्रा जाती है। पूरा शहर गुलाल से अट जाता है।

महिलाओं का प्रवेश वर्जित, अश्लील फब्तियां कसते
यात्रा में लोग नाचते-गाते जाते हैं। अश्लील फब्तियां कसी जाती है। ऐसे में जिस मार्ग से यात्रा गुजरती है, वहां महिलाओं का प्रवेश निषेध होता है। रास्ते में कई बार अर्थी पर लेटा व्यक्ति बार-बार खड़े होकर भागने का प्रयास करता है। लोग उसे जूते-चप्पल से मारकर लेटा देते हैं। अर्थी पर लेटे व्यक्ति को इसका मेहनताना देते है।