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हमने केवल डॉक्टर नहीं, खो दिए अपने रहनुमा

जिले के लाल, जिनकी चिकित्सा जगत में काफी मान, कोरोना काल में इन्हें खो बैठे

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हमने केवल डॉक्टर नहीं, खो दिए अपने रहनुमा

हमने केवल डॉक्टर नहीं, खो दिए अपने रहनुमा

भीलवाड़ा।
कोरोना काल में मरीजों का उपचार करते हुए भीलवाड़ा ने अपने कई जाने माने डॉक्टर खो दिए। इनमें मूल रूप से सुवाणा निवासी प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अशोक पनगडि़या, डॉ. सर्जन राधेश्याम शर्मा, डॉ. प्राणजीवन शाह तथा डॉ. माणक जैन प्रमुख रूप से शामिल हैं। इनकी सेवा हमेशा लोगों के जेहन में रहेगी। डॉक्टर डे पर मानवता के इन पुजारियों को श्रद्धासुमन।
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डॉ. पनगडि़या: हाथ पर प्लास्टर देखा, बता दिया कि सिर के बल गिरा होगा मूल रूप से सुवाणा निवासी न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अशोक पनगडि़या का जीवन भर अपने गांव और भीलवाड़ा के प्रति स्नेह रहा। अपने गांव में पिता की स्मृति में कई जनोपयोगी कार्य कराए। भीलवाड़ा से जयपुर गए मरीज को प्राथमिकता से देखते थे। डॉ. पनगडिय़ा इतनी ऊंचाई तक जाने के बावजूद सुवाणा वालों को नहीं भुलते थे। उनका बचपन व शिक्षा जयपुर में हुई लेकिन साल में एक बार परिवार के साथ गांव जरूरत आते थे। १९९४-९५ के दौर में डॉ. पनगडिय़ा गुलाबपुरा आते थे तो मैं मिलने जाता था। एक दिन डॉ. पनगडिय़ा सुवाणा आए व बस स्टैण्ड पर खड़े एक युवक के हाथ पर प्लास्टर बंधा देखा तो उसे बुलाया। पूछा कि सिर के बल कैसे गिरा, जबकि सिर पर चोट नहीं थी। उसे कागज पर इंजेक्शन लिखकर दिया कि इसे तुरंत लगवा लें। युवक से कहा कि तेरी आंखों पर असर आ रहा है। यह देखकर मैं व युवक चकित रह गए कि उन्हें कैसे पता लगा कि युवक सिर के बल गिरा। डॉ. पनगडिय़ा को सुवाणा का कोई भी व्यक्ति भुला नहीं सकता है।
गणपतलाल चपलोत, समाजसेवी सुवाणा
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डॉ. शर्मा: आंखों के सात हजार ऑपरेशन करवाए
जाने माने सर्जन डॉ. राधेश्याम शर्मा जमीन से जुड़े व गरीबों के डॉक्टर माने जाते थे। माता ने बड़े कष्ट झेलते शर्मा को डॉक्टर बनाया था। डॉ. शर्मा ने शुरू से गरीबी को करीब से देखा। इसके कारण गरीबों की सेवा में हमेशा लगे रहे। वे बड़े राम भक्त थे। राम मंदिर के लिए अपने डॉक्टर साथियों से मिलकर चंदा एकत्र किया था। घोड़ास के हनुमान मंदिर में बड़ी आस्था थी। लोकमंगल सेवा समिति के माध्यम से करीब २७ साल में उन्होंने यहां आंखों के शिविर लगाए। इसमें लगभग ७ हजार ऑपरेशन कराए गए। डॉ. शर्मा की पुत्री हर्षिता शर्मा ने बताया कि पापा ने विद्यादेवी चेरिटेबल ट्रस्ट बना रखा था। इसके माध्यम से गरीबों का उपचार व दवा तक निशुल्क देते थे। वर्ष २००७ में महात्मा गांधी अस्पताल से सेवानिवृत होने के बाद अपने अस्पताल शर्मा हॉस्पिटल में मरीजों का इलाज करते थे। जूनावास में बचपन बिताने के बाद काफी संघर्ष से माणिक्य नगर में मकान व हॉस्पिटल बनाया था। आज पापा हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमेशा हमारे साथ हैं। डॉ. हर्षिता शर्मा
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डॉ. शाह: कम दवा में अच्छा उपचार
डॉ. प्राण जीवन शाह हमेशा कम खर्च में अच्छा उपचार करते थे। गरीब व मध्यम वर्ग के मरीज हमेशा उनके पास आते थे। डॉ शाह ने 25 वर्ष पूर्व भीलवाड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के पद से सेवानिवृत होने के बाद नागोरी गार्डन में निजी चिकित्सक के रूप में सेवा देना शुरू किया था। शहर के हजारों लोग उनके मुरीद थे। डॉ. शाह की सबसे बड़ी विशेषता कम दवा में अच्छा इलाज थी। मैं वर्षों उनके संपर्क में रहा। मैंने कई बार देखा कि स्थिति देख कर फीस भी नहीं लेते थे। मरीज को दवा भी अपने पास से देते थे। भीलवाड़ा के बड़े घराने के लोगों से लेकर साधारण आदमी उनके मरीज थे। आज उनकी कमी बहुत खलती है। -एमके जैन, मेवाड़ चेम्बर
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डॉ. जैन: साधुओं की सेवा में लगे रहे
डॉ. माणक जैन ने सरकारी सेवाओं से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर आरसी व्यास कॉलनी में निजी चिकित्सालय बनाया। वे बहुत अच्छे सर्जन थे। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों लोग उनके पास इलाज को आते थे। समाज सेवा में उन्होंने बड़े आयाम स्थापित किए। जैन एवं अन्य समाज के साधुओं की सेवा में लगे रहते थे। मुझे याद है 2015 में मुनि सुधासागर महाराज के भीलवाड़ा प्रवास के समय उन्होंने दिन रात सेवाएं दी। किसी भी श्रावक की बीमारी की सूचना पर रात को 2 या 4 बजे कुछ मिनट में मंदिर या धर्मशाला पहुंच जाते थे। जैन समाज को उनकी कमी बहुत खलेगी।
सुरेंद्र गोधा, आरके कॉलोनी
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डॉ.रामावत: अन्तिम समय तक गरीबों की सेवा
बिजौलियां के डॉक्टर डीके रामावत गरीबों की सेवा के लिए हर समय तत्पर रहते थे। वे कोरोना संक्रमित होने से पहले तक मरीजों का इलाज करते रहे। कब कोरोना हुआ, उनको पता भी नहीं चला। भीलवाड़ा के निजी अस्पताल से छुट्टी मिलने के अगले दिन तबीयत बिगडऩे पर कोटा में भर्ती कराया गया लेकिन बचाया नहीं जा सका। डॉ. रामावत काफी मिलनसार थे। सरकारी सेवा के दौरान उन्होंने बिजौलियां, काछोला तथा सलावटिया में गरीबों की सेवा की थी। उसके कारण ही हर मरीज उनके पास जाना ज्यादा पंसद करते थे। अब उनकी कमी खलती है।
डॉ. डीएस मेहर मित्र