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काली खोली में 90ए करने के बाद किया निरस्तीकरण

भिवाड़ी. बीडा में गत वर्ष भूरूपांतरण की दर्जनों फाइल दबाने और जानकारी नहीं देने पर पत्रिका ने पांचवे दिन छानबीन की। 90ए कराने वाले जानकारों से बातचीत की जिसमें निकलकर सामने आया कि माफिया को फायदा पहुंचाने के लिए गलत 90ए भी कर दी गईं, जिसे बाद में निरस्त करना पड़ा। ऐसा ही मामला काली […]

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भूपरिवर्तन होने के बाद समझी विकसित भूमि, निरस्त होने के बाद फंस गई जीवनभर की कमाई

भिवाड़ी. बीडा में गत वर्ष भूरूपांतरण की दर्जनों फाइल दबाने और जानकारी नहीं देने पर पत्रिका ने पांचवे दिन छानबीन की। 90ए कराने वाले जानकारों से बातचीत की जिसमें निकलकर सामने आया कि माफिया को फायदा पहुंचाने के लिए गलत 90ए भी कर दी गईं, जिसे बाद में निरस्त करना पड़ा। ऐसा ही मामला काली खोली में सामने आया, जिसमें बीडा ने 90ए की और बाद में निरस्त कर दी। बीडा की इस कारगुजारी का फायदा उन लोगों को उठाना पड़ा, जिन्होंने वहां 90ए होने के बाद भूमि की किस्म में परिवर्तन समझकर, उक्त भूमि को विकसित भूमि मान लिया और आवेदक से भूखंड खरीद लिए। आमजन ने विकसित भूमि होने की वजह से महंगे दामों में जमीन खरीदी, बीडा ने 90ए को निरस्त कर दिया, अब ऐसे लोग ठगे हुए महसूस कर रहे हैं, उनकी जीवनभर की पूंजी भूखंड खरीदने में चली गई। बीडा की एक गलती का खामियाजा कई जनों को उठाना पड़ रहा है। बीडा की वजह से फंसे हुए लोगों को हर्जाना कौन देगा। विकास की योजना बनाने वाले विभागों को सोच विचारकर फैसला लेना चाहिए, जिससे कि आमजन का अहित नहीं हो।

बाद में समझ आया मामला
90ए निरस्त करने के पीछे बीडा अधिकारी कई तर्क दे रहे हैं। जानकार इसमें राजनीतिक दबाव भी मान रहे हैं लेकिन असल बात यह है कि अगर 90ए हो सकती थी तो होनी चाहिए थी। 90ए नहीं हो सकती थी, तब फाइल स्वीकृत नहीं करनी थी। इस तरह 90ए कर निरस्त करने से आमजन का नुकसान होता है। जमीन बेचने वाले पैसे लेकर निकल जाते हैं, फंसता वही है जिसे इस तरह के गणित समझ नहीं आते।

शायद इसलिए दबा रहे फाइल
बीडा ने 90ए संबंधी पत्रावली नहीं दी, शायद इसका यही कारण है कि 90ए में गड़बड़ हुई है। कारोली में बिना रास्ते के भूपरिवर्तन कर दिया गया और काली खोली में भूपरिवर्तन करने के बाद निरस्त कर दिया गया। अपने ही अधिकारियों के खरीदे भूखंडों का भी भूपरिवर्तन कर दिया। इस तरह 90ए में कई तरह की गड़बड़ की आशंका और बढऩे लगी है। तभी बीडा ने सार्वजनिक पत्रावली को दबाना बेहतर समझा।