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सफलता के लिए धैर्य और निरंतरता को बनाएं पूंजी, मुनाफा और नुकसान व्यवसाय के दो पहलू

व्यवसाय में दो बार गिरकर खड़े हुए बीएम के पूर्व अध्यक्ष

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भिवाड़ी. जीवन में सफलता की कोई परिभाषा नहीं होती। जिसे गिरकर खड़ा होना आता है, जिसे हारकर जीतना आता है, जिसे नुकसान झेलकर दोबारा व्यवसाय करना आता है, जिसे रुककर दोबारा चलना आता है वही सफलता की परिभाषा गढ़ पाता है। कुछ ऐसी ही कहनी और औद्योगिक संगठन बीएमए के पूर्व अध्यक्ष बृजबिहारी कौशिक की। दोसोद बहरोड़ निवासी कौशिक 2015-2017 में बीएम अध्यक्ष रहे। कौशिक के पिता शिक्षक थे, घर में नौकरीपेशे का माहौल था, पिताजी भी यही चाहते थे कि बेटा पढक़र कोई सरकारी लिपिक ही बन जाए। बेटे ने सोचा कि व्यवसायी बनना है लेकिन कोई रूट मैप नहीं था, कोई गाइडेंस नहीं था, आसपास में कोई माहौल नहीं था, अन्य परिजन भी सरकारी नौकरी में थे। कौशिक बताते हैं कि 1985 में 11वीं करने के बाद 18 साल की उम्र में दिल्ली गया, वहां पर 325 रुपए महीने वेतन पर एक्सपोर्ट कंपनी में नौकरी की। नौकरी के साथ ग्रेजुएशन किया। अप्रेल 1990 तक नौकरी की और उसी साल विवाह हो गया। अक्टूबर 1990 में रेडीमेड गार्मेंट फैक्ट्री ओखला दिल्ली में लगाई और माल एक्सपोर्ट करना शुरू किया। तीन साल फैक्ट्री चलाई, 1993 में खाड़ी युद्ध शुरू हो गया, जिसकी वजह से निर्यात बंद हो गया, छह महीने तक युद्ध बंद होने का इंतजार किया लेकिन कोई हल नहीं निकला फैक्ट्री बंद करनी पड़ी, जमा हुआ व्यवसाय एक झटके में खत्म हो गया। फैक्ट्री बंद करने के बाद कंस्ट्रशन लाइन में आ गया और भिवाड़ी धारूहेड़ा में काम शुरू किया। ईस्ट इंडिया, सिद्धार्थ पेपर कंपनी, पीतांबर कोटेड पेपर में शुरुआती दौर में काम शुरू किया। 2006 में स्टील फैब्रिकेशन एंड वुडन फर्नीचर की फैक्ट्री लगाई, इस काम में हमेशा प्रगति ही मिली। यह काम अभी भी जारी है। रियल एस्टेट सेक्टर में 2012-13 में मंदी आई, जिसकी वजह से करीब सौ करोड़ रुपए का घाटा हो गया। जिन बिल्डर के यहां काम किया, वह सभी घाटे में चले गए और कहीं से पैसा वापस नहीं मिला। चार-पांच साल तक मंदी की मार झेली, कहीं से कोई रिकवरी नहीं हुई। अब यह पैसा डूब चुका है। 2017 में गुजरात जाकर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू किया। अब अच्छा काम चल रहा है। वार्षिक कई सौ करोड़ का टर्नओवर चल रहा है। मैंने जिंदगी की योजना बनाई कि 50 की उम्र में दोनों बच्चों की शादी करने के बाद काम बंद करने के बाद सामाजिक सेवा करूंगा लेकिन व्यवसाय में हुए नुकसान ने मेरी सोच को बदला और 50 की उम्र में मैंने दोबारा अपने आप को खड़ा किया। कौशिक कहते हैं कि आज के युवा जिंदगी में थोड़ा बहुत उतार चढ़ाव आते ही धैर्य खो देते हैं। उन्हें सलाह है कि निरंतर काम में लगे रहे निश्चित ही सफलता मिलेगी। कोई भी बड़ा व्यवसायी हो सभी को व्यापार में नफा नुकसान होता है, सबसे बड़ी पंूजी धैर्य और निरंतरता है। काम पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए।