
भिवाड़ी. काली खोली धाम में बाबा मोहनराम की अखंड ज्योत 350 साल से प्रज्जवलित हो रही है। सालभर में लाखों भक्त बाबा मे दरबार में दर्शन को आते हैं। होली और रक्षाबंधन पर तीन दिवसीय लक्खी मेला भरता है। बाबा मोहनराम को भिवाड़ी की सरकार कहा जाता है। बाबा मोहनराम को भक्तजन भगवान भोलेनाथ, विष्णु और श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में पूजते हैं। बाबा का स्वरुप दिव्य ज्योत को माना जाता है। काली खोली धाम में लालू भगत ने 350 साल पहले अखंड ज्योत प्रज्जवलित की थी, यह आज भी प्रज्जवलित होकर भक्तों को अलौकिकता प्रदान कर रही है।
बाबा मोहनराम ट्रस्ट अध्यक्ष अमर भगत ने बताया कि 350 साल पहले ग्वाले लालू भगत को काली खोली धाम में बाबा मोहनराम के दर्शन हुए थे। बाबा मोहनराम के दर्शन के बाद उनके घोड़े के 12 निशान बने, जो आज भी पूजे जाते हैं। इसे भीम खोज के नाम से जाना जाता है। ये निशान आज भी काली खोली धाम के पहाड़ों पर उभरे हुए हैं। खोली की पहाडिय़ों में शेषनाग की गुफा है। मान्यता है कि जब भक्तों को बाबा ने दर्शन दिए तो वे घोड़े के साथ इसी गुफा में अंदर घुसे और अदृश्य हो गए।
जोहड़ पर पानी पीने आती हैं गाएं
काली खोली धाम के पहाड़ के ऊपर प्राकृतिक जोहड़ है, जिसमें साल भर पानी भरा रहता है। खोली क्षेत्र में गायों को चराने के बाद ग्वाले यहीं पर पानी पिलाते थे। इसके साथ ही यहां मान्यता है कि जोहड़ के पानी से स्नान करने और मिट्टी लगाने से व्यक्ति के कष्ट दूर हो जाते हैं।
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छांटते हैं जोहड़ की मिट्टी : खोली धाम के नीचे जोहड़ है। जोहड़ को लेकर मान्यता है कि जो भक्त जोहड़ से मिट्टी छांटने के बाद दूसरी जगह डालते हैं, उनकी मनोकामना को बाबा मोहनराम पूरा करते हैं।
शेखू की 12 वीं पीढ़ी कर रही गुणगान
बाबा की अखंड ज्योत से हर कोई रोशन हो रहा है। ऐसा ही एक मुस्लिम परिवार है जिसकी 12 पीढिय़ां बाबा मोहनराम का गुणगान कर रही हैं। मिलकपुर गांव में रहने वाले जाकिर बताते हैं कि शेखू उनके पूर्वज थे। अब उनकी 12 वीं पीढ़ी चल रही है। उनकी सभी पीढिय़ां बाबा का गुणगान करती रही हैं।
शिला बाजनी बजाकर खिलाते थे प्रसादखोली धाम के पहाड़ों में परिक्रमा मार्ग पर एक जगह पर पत्थर बजते हैं, जिसे शिला बाजनी कहते हैं। इस शिला से पत्थर बजाने पर उसमें से घंटे की ध्वनि आती थी। इसकी आवाज आसपास के गांव तक सुनाई देती है। जब वहां जंगल थे, तब ग्वाले इसी शिला को बजाकर एकत्रित हो जाते थे। इसी तरह भक्त जनों द्वारा दही-मलीदा का प्रसाद खिलाने के लिए इस शिला को बजाया जाता था।
Updated on:
11 Apr 2023 11:24 am
Published on:
11 Apr 2023 09:18 am
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