
पदोन्नति में उच्च पदों पर सरकार की हरी झंडी
भोपाल। मध्यप्रदेश में पदोन्नति को लेकर राज्य सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है. कर्मचारियों के संगठनों ने यह गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि उच्च पदों पर पदोन्नति को हरी झंडी दी जा रही है जबकि छोटे कर्मचारियों पर रोक लगाई जा रही है. कर्मचारी संघों के पदाधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि पदोन्नति के संबंध में सरकार का रवैया पूर्णत: भेदभावपूर्ण है। सरकार को समान नियम बनाकर कर्मचारियों की पदोन्नति करनी चाहिए। खास बात यह है कि राज्य सरकार कर्मचारियों को सशर्त पदोन्नति दे सकती है पर ऐसा करने की बजाए सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही है.
राज्य वन सेवा के अधिकारियों को भारतीय वन सेवा में पदोन्नत किया जा रहा है। डाक्टरों को भी पदोन्नति दी जा रही है. स्वास्थ्य विभाग ने 451 डाक्टरों को द्वितीय से प्रथम श्रेणी में पदोन्नत किया है। इससे पहले राज्य सरकार राज्य वन सेवा, जल संसाधन विभाग में अभियंताओं और पशुपालन विभाग के डाक्टरों को पदोन्नति दे चुकी है। पुलिस विभाग में मैदानी कर्मचारियों को वरिष्ठ पद का प्रभार दिया गया है।
प्रदेश में 6 साल से पदोन्नति पर रोक है। प्रदेश में वर्तमान में साढ़े चार लाख से अधिक नियमित कर्मचारी हैं। सभी कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ नहीं दिया जा रहा है. पदोन्नति में आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इसी को आधार बनाकर राज्य सरकार तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को पदोन्नत नहीं कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने एमपी हाईकोर्ट के फैसले को यथास्थिति रखा है।
कर्मचारियों को सशर्त पदोन्नति दे सकती है सरकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे अधिकारी— इधर आरक्षित और अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी संयुक्त रूप से राज्य सरकार से कह चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अधीन सशर्त पदोन्नति दे दें। फिर भी राज्य सरकार कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार कर रही है।
30 अप्रैल 2016 को एमपी हाईकोर्ट ने मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002 निरस्त कर दिया था. राज्य में तब से ही पदोन्नति पर रोक लगी है। इसके बाद से लेकर अब तक राज्य के 70 हजार से ज्यादा कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इनमें से 36 हजार कर्मचारियों को पदोन्नति नहीं मिली।
Published on:
17 Jul 2022 08:09 pm
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