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‘अल्जाइमर’ से पीड़ित’ व्यक्ति की चली जाती है ‘याददाश्त’, ये 6 लक्षण न करें इग्नोर

World Alzheimer's Day 2025: विशेषज्ञों के अनुसार हल्के और मध्यम स्तर के अल्जाइमर एक रोगी को 24 घंटे देखभाल और दवाइयों पर कम से कम सालाना 60 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च होते हैं।

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फोटो सोर्स: पत्रिका

फोटो सोर्स: पत्रिका

World Alzheimer's Day 2025: बुजुर्गों को होने वाला रोग अल्जाइमर डिमेंशिया सिर्फ याददाश्त ही नहीं छीनता, बल्कि मरीज के परिवार और सरकार पर भारी आर्थिक बोझ भी बढ़ाता है। यह परिवार को भावनात्मक रूप से गहरी चोट देता है। भोपाल में डिमेंशिया और अल्जाइमर से पीड़ित बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 2011 की जनसंख्या के आधार पर भोपाल में 60 वर्ष से अधिक उम्र के करीब छह लाख बुजुर्ग हैं। इसमें से 40 हजार से ज्यादा इस बीमारी से पीड़ित हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार हल्के और मध्यम स्तर के अल्जाइमर एक रोगी को 24 घंटे देखभाल और दवाइयों पर कम से कम सालाना 60 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च होते हैं। गंभीर अवस्था में यह खर्च ढ़ाई लाख रुपए से भी अधिक हो जाता है। अक्सर घर का एक सदस्य नौकरी छोड़कर देखभाल में लग जाता है। इससे परिवार की आय घटती है और आर्थिक संकट और गहरा जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अकेले भोपाल में ही इस बीमारी का वार्षिक आर्थिक बोझ 300 से 500 करोड़ रुपए तक हो सकता है।

सुविधाओं की भारी कमी

चिंता यह है कि शहर और राज्य स्तर पर अल्जाइमर रोगियों के लिए कोई मजबूत देखभाल प्रणाली मौजूद नहीं है। न तो दीर्घकालिक देखभाल बीमा है, न ही डे केयर केंद्र और आवासीय देखभाल सुविधाएं। डिजिटल समाधान और सपोर्ट सिस्टम भी लगभग नहीं के बराबर हैं। नतीजा पूरा आर्थिक बोझ परिवारों पर ही आ जाता है।

विशेषज्ञ ने समय रहते सामुदायिक स्क्रीङ्क्षनग, सरकारी अस्पतालों में डिमेंशिया क्लीनिक और किफायती दवाओं की उपलब्ध कराने को जरूरी बताया। न्यूरोलॉजिस्ट आडी चौरसिया ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में डिमेंशिया व अल्जाइमर को शामिल कर दीर्घकालिक देखभाल सुविधाओं का विकास किया चाहिए।

ये हैं लक्षण

-रोज के कामों में परेशानी होनी
-समय और जगह की समझ खोने लगना
-भाषा से जुड़ी परेशानियां होना
-फैसले लेने की क्षमता में कमी होना
-सोशल एक्टिविटीज से दूर हो जाना
-मूड और पर्सनालिटी में असामान्य बदलाव होगा

एक व्यक्ति के अल्जाइमर और डिमेंशिया होने से देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में योगदान देने वाले दो व्यक्तियों की उत्पादकता खत्म हो जाती है। व्यक्ति मरीज बनने के बाद दूसरे पर आश्रित हो जाता है और परिवार का एक व्यक्ति, उसके देखरेख के लिए सब कुछ छोड़ देता है। इसके अलावा दवाइयों और जांच में पर महीने हजारों रुपए खर्च हो जाते हैं।- प्रोफेसर डॉ. आदेश श्रीवास्तव, न्यूरोलॉजिस्ट, एम्स भोपाल