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दुकानों, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, अस्पतालों पर टंगे हैं 45 हजार बोर्ड, पंजीयन एक का भी नहीं

11 नवंबर थी पंजीयन की आखिरी तारीख, निगम को पंजीयन और प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में मिलते 50 करोड़ रुपए

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दुकानों, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, अस्पतालों पर टंगे हैं 45 हजार बोर्ड, पंजीयन एक का भी नहीं

दुकानों, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, अस्पतालों पर टंगे हैं 45 हजार बोर्ड, पंजीयन एक का भी नहीं

भोपाल. नगर निगम प्रशासन आउटडोर मीडिया रूल्स 2017 को दुकानों, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, मॉल्स, अस्पताल जैसे बड़े भवनों पर लागू नहीं करा सका है। इन भवनों में लगे बड़े बोर्ड तय नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। नियमानुसार बोर्ड की ऊंचाई ढाई फीट और लंबाई भवन के आकार के अनुरूप होना चाहिए। इनका पंजीयन कराना भी अनिवार्य है। इसके लिए निगम प्रशासन ने दस नवंबर की तारीख तय की थी, पर सोमवार तक एक भी व्यक्ति पंजीयन के लिए नहीं आया। निगम प्रशासन के मुताबिक शहरभर के प्रतिष्ठानों में 45 हजार से अधिक बोर्ड लगे हैं। इनके पंजीयन और प्रोसेसिंग फीस से ही 50 करोड़ की आय होती। मालूम हो कि पंजीयन के लिए दस हजार रुपए तो एक हजार रुपए प्रोसेसिंग फीस तय है। जानकारों के मुताबिक इस राशि से शहर विकास को रफ्तार दी जा सकती है। इन बोर्ड से मासिक और वार्षिक फीस के रूप में अलग से राशि मिलना है।

ऑनलाइन प्रकिया, फिर भी पंजीयन से दूरी
विज्ञापन बोर्ड का पंजीयन करवाने के लिए नगर निगम ने ऑनलाइन प्रकिया अपनाई है। ऐसे में अवकाश आदि का फर्क नहीं पड़ता। इसके बावजूद लोगों ने बोर्ड का पंजीयन नहीं करवाया है। नगर निगम अपर आयुक्त मेहताब सिंह गुर्जर का कहना है कि पंजीयन के लिए समयसीमा तय की थी, अब कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद पंजीयन में इजाफा होगा।

विज्ञापन बोर्ड से पटा है शहर
बेतरतीब प्रचार बोर्ड के कारण शहर की सुंदरता खराब हो रही है। बोर्डों की लगातार बढ़ रही संख्या पर अंकुश लगाने के लिए पंजीयन जरूरी किया है। इससे दुकानों, कॉम्प्लेक्स, अस्पतालों में लगे मनमर्जी के बोर्डों की बजाय एक समान आकार के छोटे बोर्ड लग सकें। निगम प्रशासन ने बीते दिनों सड़क किनारे, छतों, खाली प्लॉट्स में बगैर अनुमति लगे बोर्ड-होर्डिंग्स निकाले हैं, लेकिन दुकानों, कॉम्प्लेक्स समेत व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बोर्ड पर कार्रवाई नहीं की है।

जोन प्रभारी नहीं करा पा रहे कार्रवाई
नियम विरुद्ध लगे प्रचार बोर्ड पर कार्रवाई करने का जिम्मा जोन स्तर के अधिकारियों को दिया गया है। जोन अधिकारियों ने इस दिशा में काम नहीं किया है। जानकारों के मुताबिक मिलीभगत के कारण कार्रवाई से बचा जा रहा है। ऐसे में निगम प्रशासन को अधिकारियों की जवाबदेही तय करना होगी।