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भोपाल। तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद महिला स्वास्थ्य को लेकर परिवारों में बहुत अधिक बदलाव नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि मासिक धर्म के दौरान देश में 15-24 आयु वर्ग की 50 प्रतिशत लड़कियां/महिलाएं अब भी कपड़े का उपयोग करने को मजबूर हैं। जो महिलाएं स्वच्छ तरीकों का उपयोग कर रही हैं, उनमें 64% महिलाएं सैनेटरी नैपकिन व 15% महिलाएं स्थानीय तौर पर तैयार नैपकिन का उपयोग करती हैं।
यह खुलासा एनएफएचएस-5 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) की रिपोर्ट में हुआ है। हालांकि इससे पहले के एनएफएचएस-4 सर्वे में कपड़े का इस्तेमाल करने वाली लड़कियों/महिलाओं का प्रतिशत 62 था। ताजा सर्वे के अनुसार मासिक धर्म में सुरक्षा के लिए कपड़े का उपयोग शहरी क्षेत्रों की 31.5% महिलाओं की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में अधिक है। इनका आंकड़ा 57.2% है।
गरीब वर्ग में कपड़ों का उपयोग ज्यादा
महंगाई के दौर में सैनेटरी नैपकिन खरीदना मुश्किल हो गया है। आमतौर पर ब्रांडेड पैड के पैकेट 30 से 40 रुपए से शुरू होते हैं। गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए इतने पैसे खर्च करना भी मुश्किल है। संभवत: यही वजह है कि गरीब वर्ग की 74.4% महिलाएं मासिक धर्म के दौरान कपड़े का उपयोग करती हैं। सर्वे में चौंकाने वाला तथ्य ये है कि अमीर वर्ग की 22.8% महिलाएं भी कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। यदि तमाम स्वच्छ विधियों को देखें तो बिहार में सबसे कम 59.2% महिलाएं उपयोग करती हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश 60.9%, मेघालय 65.3%, गुजरात 66.9% और असम की 67 फीसदी महिलाएं उपयोग करती हैं।
ये हैं वजह
पीरियड्स के बारे में बात नहीं करना।
परिवार की महिलाओं से साझा नहीं करना।
पैरेंट्स को संबंधित रोगों की समुचित जानकारी नहीं होना।
नैपकिन खरीदने के लिए पैसे मांगने में भी हिचक।
ये हैं खतरे
बैक्टीरिया, फंगस का पनपना।
प्राइवेट पार्ट में इंफेक्शन होना।
लगातार दर्द, सूजन की शिकायत।
स्किन में रैशेज होना।
लगातार यही स्थिति रही तो कैंसर का भी खतरा।
Updated on:
16 May 2022 12:46 pm
Published on:
16 May 2022 12:43 pm
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