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एक हजार साल पुराना जबरो डांस कर सेलिब्रेट किया जाता है लोसर फेस्ट

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में सात दिवसीय लोसर फेस्टिवल  

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एक हजार साल पुराना जबरो डांस कर सेलिब्रेट किया जाता है लोसर फेस्ट

भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में गुरुवार से लोसर फेस्टिवल शुरू हुआ। लोसर लेह-लद्धाख में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायियों का नए साल के मौके पर मनाया जाने वाला ट्रेडिशनल फेस्टिवल है। लेह-लद्दाख में यह फेस्टिवल नौ दिनों तक चलता है, लेकिन यहां इसे सात दिनों तक सेलिब्रेट किया जाएगा। फेस्ट की शुरुआत परंपरागत पूजा से हुई। इसमें कलाकारों ने संग्रहालय परिसर में स्थापित मने चक्र के गोम्पा में झंडा बदलकर पूजा की। फेस्ट में शामिल होने लद्दाख से सोनम सुपारी और नौ साथी कलाकार आए हैं। इस मौके पर ग्रुप ने लोकगीत गाते हुए जबरो नृत्य भी किया।

एक हजार साल पुरानी है परंपरा

सोनम पिछले सातों सालों से यहां आ रहे हैं। सोनम के अनुसार जबरो डांस लगभग एक हजार साल पुराना नृत्य है। जिसे लद्दाख के नोमेडिक जनजाति के लोग करते हैं। लोसर को मनाने की परंपरा 17 वीं शताब्दी में राजा, जमैयांग नामग्याल ने शुरू की थी। तब से लद्दाख में नव वर्ष को त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। लोसर के पहले दिन लोग अपने घर में लगे बगीचों की साफ-सफाई करके घर में मिलने आने वाले अतिथियों और रिश्तेदारों के स्वागत स्वरुप उपहार देने के लिए खाटक (सफेद रंग के मलमल कपड़े से बना दुपट्टा, जिसे गले में माला जैसे पहनाया जाता है) लाकर रखते है। इसके बाद घरों को, मंदिरों को दीपक की रोशनी से रोशन करते हैं।

माइनस 24 डिग्री में होता है डांस

सोनम बताते हैं कि लद्दाख में त्योहार के दौरान अधिकांश समय माइनस 24 डिग्री तापमान रहता है। ये त्योहार बौद्ध कैलेंडर के दस महीने की 25 तारीख से शुरू होकर ग्यारहवें महीने की पांचवीं तारीख तक चलता है। शाम के समय सभी एकत्रित होकर जबरो डांस करते हैं। डांस से पहले आसपास आग जलाई जाती है ताकि जंगली जानवर नजदीक न आए। इस नृत्य की शुरूआत तिब्बत से मंगोल आए राजा पालगी गोंड के आने के बाद से हुई थी।