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Exclusive Story: बकरियां चराईं, मजदूरी की और राज्यसभा पहुंच गए सुमेर सिंह सोलंकी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) से जुड़े सुमेर सिंह सोलंकी के संघर्ष की कहानी...।

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भोपाल

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Manish Geete

Jun 20, 2020

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rajya sabha election 2020

आलोक पण्ड्या

भोपाल। चाय बेचने से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने का नरेंद्र मोदी का सफर देश में अब सभी को पता है। राजनीति में छोटी जगह से आगे बढऩे और गरीबी से उठकर बड़े पदों पर पहुंचने की कहानियां कम ही नजर आती हैं। मध्यप्रदेश में जब राजा-महाराजा राज्यसभा में पहुंचते हैं तो उनके साथ एक ऐसा आदिवासी युवा भी चुनाव जीतकर राज्यसभा सदस्य ( rajya sabha member ) बनता है, जिसने मजदूरी भी की और बकरियां भी चराई।

जी हां, बड़वानी जिले ( barwani ) के ठान गांव ( Than Village ) के बारेला आदिवासी समाज के 44 वर्षीय डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ( sumer singh solanki ) का जीवन ऐसी ही विषमताओं से भरा रहा है। आज भी उनके माता-पिता गांव में बहुत ही साधारण से घर में रहते हैं। पिता अब भी खेती करते हैं और बकरियां चराते हैं।

दसवीं के बाद रेग्युलर पढ़ाई नहीं कर पाए :-

सुमेर सिंह बताते हैं कि वे जिस आदिवासी समाज में पैदा हुए, वहां अधिकांश का जीवन संर्घष करते हुए ही खत्म हो जाता है। वे अपने पिता की सबसे बड़ी संतान थे, इसलिए परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति में घर चलाने का दबाव उन पर बचपन से रहा। उन्होंने अपने पिता के साथ खेती-बाड़ी में हाथ बंटाया, बकरियां चराई और मजदूरी भी की। जैसे तैसे दसवीं तक स्कूल गए, उसके बाद तंगहाली के चलते स्कूल छोड़ दिया। मजदूरी के साथ आगे की पढ़ाई चलती रही। मौका मिला तो सरकारी स्कूल में गुरुजी की नौकरी मिली, फिर शिक्षाकर्मी वर्ग 3 में भी पढ़ाया।

मोटर बाइंडिंग का काम भी किया :-

सुमेर बताते हैं कि उन्होनें घर का खर्च चलाने के लिए दस साल तक गांव में मोटर बाइंडिंग का काम भी किया। इस पैसे से उच्च शिक्षा हासिल की और आगे जाकर इतिहास में पीएचडी की उपाधि हासिल की। वे अपनी तहसील के पहले आदिवासी थे, जिसे पीएचडी की डिग्री मिली। सुमेर कहते हैं कि उसी मेहनत के कारण 2005 में एमपी पीएससी के जरिए असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर चयन हुआ। लेकिन परिवार में आज भी वही सादगी कायम है। सुमेर के पिता अब भी खेत में हल जोतते हैं, बकरियां चराते हैं। सुमेर बताते हैं कि जब वे अपने गांव से राज्यसभा चुनाव के लिए भोपाल रवाना हो रहे थे तो उनके पिता खेत में बुवाई की तैयारी कर रहे थे और मां बीज चुन रही थी। उन्होंने पिता को राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया समझाई। पिता के कहा, तुम जरूर सफल होओगे।

संघ से जुड़े, जयस की तोड़ के रूप में उभरे :-

सुमेर सिंह सोलंकी पूर्व सांसद मकनसिंह सोलंकी के रिश्तेदार हैं। बचपन से ही वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे और वनवासी अंचल में संघ की पैठ बढ़ाने के लिए भी काम करते हैं। पिछले दिनों मालवा-निमाड़ में उभरे आदिवासी संगठन जयस ने जब भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी की तो राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने जयस की तोड़ के लिए सुमेर सिंह का नाम राज्यसभा के लिए आगे बढ़ाया। सुमेर ने असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी छोड़ अब राजनीति की राह पकड़ी है।

आदिवासी समाज के लिए करूंगा काम :-

सुमेर कहते हैं कि आदिवासी समाज आज भी कई सुविधाओं से वंचित है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास महत्वपूर्ण है। शिक्षक के रूप में उनका दायरा सीमित था। अब वे राज्यसभा सदस्य बनकर आदिवासी समाज के उत्थान के लिए काम करेंगे।