कार्य तो पूर्ण करना है तो सभी को छोटे छोटे कदम उठा कर बड़े से बड़े कार्य को पूर्ण किया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि श्रावक जिम्मेदारी के साथ कदम आंगे बढ़ाएं, मंजिल तक स्वत: ही पहुंचा जा सकता है। आचार्यश्री ने कहा कि कार्य को करने के लिए समयावधि तैयार करना होगी। तैयारी के साथ ही कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए, क्योंकि सामने रास्ता तैयार है, लेकिन उस रास्ते पर चलना प्रारंभ करना होगा। एक चाल एक दिशा में कदम उठाना चाहिए। सेनापति के अनुसार ही पंच परमेष्ठी हुआ करते हैं।