
'कादम्बरी' नाटक
भोपाल। मप्र नाट्य विद्यालय (एमपीएसडी) के वर्ष 2017-18 बैच के साथ तैयार किए गए नाटक 'कादम्बरी' का सलेक्शन एशिया के सबसे बड़े थिएटर फेस्टिवल भारत रंग महोत्सव के लिए हुआ था लेकिन फरवरी 2019 में होने जा रहे 20वें भारत रंग महोत्सव में यह नाटक मंचित नहीं हो सकेगा। दरअसल, एमपीएसडी के मौजूदा डायरेक्टर ने एनएसडी को ई-मेल के जरिए अपनी एंट्री को स्थगित करने को कहा है। इसके पीछे तकनीकी और वित्तीय कारण बताए जा रहे हैं। वजह कुछ भी हो लेकिन बाणभट्ट की 7वीं सदी की रचना कादम्बरी को मंच पर पहली बार हिंदी में पेश करने वाले मप्र नाट्य विद्यालय के हाथों से यह बेहतर अप्च्युर्निटी छिन गई है।
डायरेक्टर बदलने के कारण शुरू हुई कॉन्ट्रोवर्सी
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की ओर से 1 फरवरी 2019 से आयोजित होने वाले इस महोत्सव के लिए इस साल 31 अगस्त से पहले मंचित हुए नाटकों की एंट्री 10 सितम्बर से पहले भेजी जानी थी। नाट्य विद्यालय के तत्कालीन डायरेक्टर संजय उपाध्याय ने 'कादम्बरी' नाटक को बतौर एंट्री भेजा था। जिसका हाल ही में सलेक्शन भी हो गया था। इस बीच नाट्य विद्यालय की जिम्मेदारी नए निदेशक आलोक चटर्जी के हाथों में आ गई। उन्होंने तकनीकी और वित्तीय दिक्कतों का हवाला देते हुए यह निर्णय लिया है। आपको बता दें, भारत रंग महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1999 में हुई थी। वर्ष 2018 में 8वें थिएटर ओलंपिक की मेजबानी भारत देश को मिली थी जिसके चलते एनएसडी का यह थिएटर फेस्टिवल नहीं हो सका था।
18 लाख है बजट और मिलेंगे सिर्फ 1.5 लाख
पत्रिका से हुई बातचीत में एमपीएसडी के डायरेक्टर आलोक चटर्जी ने बताया कि 'कादम्बरी' नाटक में मेन लीड करने वाली दो स्टूडेंट्स का सलेक्शन इस साल नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में हो गया है। वे वहां तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट में बंध गई हैं, ऐसे में वे बाहर किसी भी नाट्य प्रस्तुति में हिस्सा नहीं ले सकती हैं।
इसके अलावा इस नाटक के लिए बिहार व अन्य राज्यों से करीब 16 एक्सपर्ट भी आए थे। भारत रंग महोत्सव हमें नाटक के लिए महज 1.5 लाख रुपए की राशि देता है। लेकिन इस नाटक का बजट ही 18 लाख रुपए है। ऐसे में इसे फेस्टिवल में भेजना सही निर्णय नहीं है।
'कादम्बरी' नाटक में क्या है खास
बाणभट्ट द्वारा लिखित 1200 साल पुराने उपन्यास कादम्बरी पर आधारित इस नाटक का रूपांतरण रीवा के योगेश त्रिपाठी ने किया और निर्देशन मप्र नाट्य विद्यालय के एक्स डायरेक्टर संजय उपाध्याय ने किया है। इसकी काव्य रचना शहडोल के शरद मिश्र ने की है। यह मुख्य रूप से संस्कृत की कृति है, इसे विश्व का पहला उपन्यास कहा जाता है। 7वीं शताब्दी की इस काल्पनिक कथा पर इससे पहले कभी नाटक तैयार नहीं किया गया है। नाटक में बारिश, आग, चांद, सूरज, हवा, पानी आदि के दृश्यों की फैंटेसी क्रिएट करने के लिए स्पेशल इफेक्ट्स का प्रयोग किया गया है। नाटक की तैयारियों के लिए स्टूडेंट्स के लिए सीधी में सात दिवसीय भ्रमणशील कार्यशाला भी की। 2 घंटे 20 मिनट के इस नाटक में 25 कलाकारों अभिनय करते हैं।
पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिया गया निर्णय
इस पूरे मामले पर नाटक के निर्देशक और एमपीएसडी के पूर्व निदेशक संजय उपाध्याय का कहना है कि यह निर्णय पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिया गया है। अगर यह नाटक भारत रंग महोत्सव में जाता तो इससे मप्र नाट्य विद्यालय का कद बढ़ता और स्टूडेंट्स का मनोबल बढ़ता। पैसा सम्मान से बड़ा नहीं है और अगर नाट्य विद्यालय इसके लिए थोड़ा पैसा खर्च कर लेता तो इससे उसका सम्मान ही बढ़ता, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनती। मेरा मानना है कि व्यक्ति नहीं संस्थान बड़ा होता है।
Published on:
03 Nov 2018 03:57 pm
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