
Ramzan Special : इस शहर में है एशिया की सबसे छोटी मस्जिद, सिर्फ 3 लोग ही पड़ सकते हैं यहां नमाज़
भोपाल/ रोजे और इबादत का पवित्र महीना रमज़ान चल रहा है। हालांकि,लोगों को इस बार अपनी सभी इबादतें घर पर ही पढ़ने की अनुमति मिली है। इबादत के ये खास महीना हो और मस्जिदों का जिक्र किया न जाए, ये मुम्किन नहीं है। तो चलिए आज हम आपको शहर में मौजूद एशिया की सबसे एतिहासिक मस्जिद के बारे में बताएंगे। आइये जानें, मस्जिद की खासियतें।
इन बातों का रखें खास ख्याल
कोरोना वायरस के तेजी से फैलते संक्रमण के चलते इस बार मस्जिदों में पढ़ी जानें वाली तरावीह समेत सभी नमाज़ें मस्जिद में रहकर सिर्फ ज्यादा से ज्यादा 5 लोगों के अदा करने की इजाज़त मिली है। उलेमाओं का कहना है कि, इन बातों का खास ख्याल रखना है।
रायसेन के काजी ने रखी थी मस्जिद की संगे हाथ
इस मस्जिद की तामीर के साथ ही शहर में मुसलमानों की आमद बताई गई है। भोपाल के पहले नवाब सरदार दोस्त मोहम्मद खां ने अपनी बेगम फतेह बीवी की ख्वाहिश पर उनके नाम से सन 1767 में फतेहगढ़ किले की तामीर एक ऊंची पहाड़ी पर बड़े तालाब के किनारे करवाई थी। इस किले खी शुरुआत में एक विशाल वजू खाना बचा हुआ है। इसी बुर्ज पर एक छोटी सी मस्जिद तामीर करवाई गई। इस मस्जिद का संगे बुनियाद रायसेन के काजी मोहम्मद मुअज्जम के हाथों करवाया गया।
ऐसा माना जाता है
तीन मंजिला इस मस्जिद को ढाई सीढी की मस्जिद भी कहा जाता है। कहते हैं इसकी तामीर के बाद ही यहां आबादी बढ़ी इसलिए भी इस मस्जिद को शहर की सबसे पहली मस्जिद का दर्जा हासिल हैखुद दोस्त मोहम्मद खां और उनके बेटे यार मोहम्मद खां इस्लाम नगर किले में आखिर तक रहे। खासतौर पर इस मस्जिद को यहां के पहरेदारों के लिए तामीर करवाया गया था। मस्जिद में एक मेंबर है, जिसे देखकर मालूम होता है कि, पहले कभी यहां जुमें की नमाज भी पढ़ी जाती होगी।
Published on:
10 May 2020 12:34 pm
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