
भोपाल। माता-पिता की ऊंगलिया पकड़कर जो औलाद चलना सीखती है अर वही बुढ़ापे में किनारा कर उनके हालात पर छोड़ दे तो जीवन और कठोर हो जाता है। दो वख्त की रोटी के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। कोई कलकत्ता से तो कोई कानपुर से भटकता हुआ किसी मंदिर में मिला तो किसी ने रेलवे स्टेशन पर रात गुजारी। किसी तरह कोलार स्थित अपना घर आश्रम में पहुंचे तो वहां पहले से मौजूद अन्य लोगों से मिलकर उनको ही परिवार बना लिया। हर सुख दुख में एक दूसरे के साथ रहते हैं। यहां तक की त्यौहार भी एक साथ मनाते हैं। जो खुशी उन्हें अपने बेटों और परिवार से मिलनी चाहिए, वो यहां सब मिलकर मनाते हैं।
अपना घर आश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा बताती हैं कि आश्रम में रह रहे बुजुर्गों की उम्र 70 से 80 साल के बीच में है। एक बार इनके अपनों ने किनारा किया तो पलट कर नहीं देखा। 80 साल की साधना पाठक का आज दुनिया में कोई नहीं है। जैसा वो बताती हैं, ये भटकते हुए मिलीं थीं। कलकत्ता की आशा घोष 70 साल की उम्र में रेलवे स्टेशन पर भटक रहीं थीं। तीन दिन भटकने से उनकी हालत खराब हो गई थी। कई दिन तो उन्हें ठीक होने में ही लगे थे। कानपुर की अंजली श्रीवास्तव के पति ने दूसरी शादी कर ली और इन्हें घर से बेघर कर दिया।
करीब एक माह भटकने के बाद वे अशोका गार्डन मंदिर में मिली थीं। शारदा माहौरकर के पति भेल में जॉब करते थे। रिटायरमेंट के बाद बड़े बेटे ने दोनों को घर से बेघर कर दिया। जबकि बेटा बहू दोनों सक्षम हैं। लेकिन उनसे मिलने तक नहीं आते। रमेशचंद्र सक्सेना झांसी में सरकारी महकमे से उच्च पद से रिटायर्ड हुए हैं। एक ही संतान है जो उनकी देखभाल करना तो दूर उल्टा प्रताडि़त करती थी। एक दिन उन्हें घर से ही बेघर दिया। वे किसी तरह भोपाल आए अर अपनाघर पहुंचे।
मिलजुल कर मना रहे त्यौहार
अलग-अलग राज्यों और शहरों से कोलार स्थित अपना घर में एकत्रित हुए बुजुर्ग अब मिलजुलकर त्यौहार मनाते हैं। नवदुर्गा पर्व हो या दशहरा सभी के लिए नए कपड़ों से लेकर ड्रेस तक का इंतजाम अपना घर की तरफ से किया गया। डांडिया भी जमकर किया। सुजालपुर के 80 साल के प्रेमनारायण सोनी बताते हैं कि यहां सब मिल जुलकर जिस प्रकार रहते हैं उससे परिवार की कमी कभी नहीं खलती। अब दीपावली भी वे सब साथ में मनाएंगे.
Published on:
10 Oct 2019 12:02 pm
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