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जप्त हो सकते हैं डिफॉल्टर कंपनी में 111 करोड़ रुपए निवेश के दस्तावेज, नोटिस की तैयारी

बातचीत के जरिए बैंक प्रबंधन ढूंढ रहा रास्ता, यदि पैसा वापस आ गया तो बच जाएंगे कार्रवाई से  

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भोपाल/ भोपाल को-ऑपरेटिव सेंट्रल बैंक के आरोपियों के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा डिफॉल्टर कंपनी इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेस लि. (आईएल एंड एफएल) में 111 करोड़ रुपए जमा करने से जुड़े मूल दस्तावेज कभी भी जप्त किए जा सकते हैं। ईओडब्ल्यू ने सभी जिम्मेदारों को नोटिस देकर कागज के साथ तलब करने की तैयारी कर ली है। बैंक प्रबंधन को भी नोटिस देने की तैयारी चल रही है। ईओडब्ल्यू के पास फिलहाल सहकारिता विभाग द्वारा की गई जांच रिपोर्ट ही है। इसके साथ में निवेश से जुड़े कुछ दस्तावेजों की फोटाकॉपियां है।

ईओडब्ल्यू ने केस दर्ज कर मूल दस्तावेज और बैंक के इलेक्ट्रॉनिक डाटा की छानबीन के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। केस दर्ज करने के बाद अब तक बैंक प्रबंधन को तलब नहीं किया, लेकिन नोटिस देने की तैयारी कर ली है। सभी तत्कालीन आरोपियों सहित मौजूदा बैंक प्रबंधन को नोटिस देकर मूल दस्तावेज मंगाए जाएंगे। यदि समय पर दस्तावेज नहीं दिए तो जप्ती की कार्रवाई भी की जा सकती है।

बताया जा रहा है कि बैंक प्रबंधन द्वारा तत्कालीन आरोपियों को बचाने के तरीके तलाशे जा रहे हैं। इसके लिए आईएल एंड एफएल से लगातार पत्राचार किया जा रहा है। बैंक प्रबंधन की यह कोशिश है कि वह जल्द से जल्द नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में इस बात का लिखित में जवाब पेश कर दे कि वे बैंक का पैसा कब तक लौटा देंगे। इसके लिए कंपनी को पत्र भी लिखा है, बदले में कंपनी ने जवाब दिया है कि मार्च में 15 फीसदी पैसा लौटा दिया जाएगा। लेकिन डिफॉल्टर कंपनी ने एनसीएलटी को अब तक पैसा लौटाने की समय सीमा को लेकर लिखित में जवाब पेश नहीं किया।

राहत के लिए कंपनी से चल रहा पत्राचार

बैंक प्रबंधन का मानना है कि यदि समय रहते आईएल एंड एफएल ने पैसा लौटाने को लेकर एनसीएलटी में जवाब दे दिया तो अपराध में गिरफ्तारी, चालान आदि से राहत मिल जाएगी। इसलिए बैंक प्रबंधन पैसा वापसी का प्रयास कर रहा है। इधर, बैंक प्रबंधन ने यह भी तैयारी कर रखी हैं कि यदि ईओडब्ल्यू ने नोटिस दिया तो क्या जवाब दिया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि मौजूदा बैंक प्रबंधन तर्क के साथ जवाब तैयार कर रखा है कि सेबी से सूचीबद्ध कंपनी में निवेश करना अपराध नहीं है। यह पैसा डूबत में भी नहीं जाएगा और समय रहते वापस मिल भी जाएगा।

लेकिन ईओडब्ल्यू का मानना है कि न सिर्फ डिफॉल्टर कंपनी में पैसा निवेश किया गया है, बल्कि इसकी प्रशासकीय प्रक्रियाओं में भी अनियमितता अपनाई गई है। इसलिए भले पैसा वापस आ जाए, लेकिन संबंधित आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होना तय है। ज्ञात हो कि पत्रिका के 24 नवंबर के अंक में डिफॉल्टर कंपनी में 111 करोड़ रुपए किए थे निवेश, एफआईआर दर्ज, शीर्षक से समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था।