
चेहरों पर सील भी ऐसी लगाई गई मानो वो कोई गुलाम, बंधुआ मजदूरों या कोई वांटेड अपराधी हों। यह सही है कि जेल में परिजनों को कैदियों से मिलने से पहले पहचान चिन्ह के लिए इस तरह की सील हाथ पर लगाई जाती है, ताकि कोई कैदी भीड़ का फायदा उठाकर बाहर न निकल जाए।
इस बार तो भाईयों से मिलने आई बहनों के चेहरों पर तक सोमवार को यहां बड़े ही अमानवीय ढंग से बच्चों व युवतियों के चेहरे पर सील लगा दी गई। जो देखने में ऐसी लग रही थी, जैसे वे ही कोई वांछित अपराधी हों।
इस दौरान अपने साथ हुए इस अमानवीय कार्य को लेकर परिजनों में रोष भी देखा गया, लेकिन वे कुछ करने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि उनका सोचना था कि यदि इसका विरोध करेंगे तो उन्हें रक्षाबंधन मनाने नहीं दिया जाएगा। वहीं जेल अधिकारी भी इसे गलत मान रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसा करना न तो जेल मेन्युअल में है और न ही परंपरा में।
जेल में त्योहार के समय मुलाकातियों की भीड़ रहती है तो उन्हें भीतर जाने के लिए भेजने के पहले पहचान का चिन्ह लगाए जाने की परंपरा है। जो आमतौर पर हाथ पर लगाया जाता है। लेकिन इसका जेल मेन्युअल में कोई प्रावधान नहीं है और न ही चेहरे पर पहचान लगाने की परंपरा है।
- गाजीराम मीणा, एडीजी जेल
इधर, रक्षाबंधन पर भाई बहन की एक साथ निकली अर्थी:
मध्यप्रदेश के डबरा के लोहगढ़ तिराहे पर रविवार की रात सड़क हादसे में हुई भाई-बहन की मौत के बाद सोमवार को उनके शवों का पोस्टमार्टम किया गया। इसके बाद देर शाम दोनों भाई-बहन की पार्थिव देह का स्थानीय मुक्तिधाम में एक-साथ अंतिम संस्कार किय गया। रक्षाबंधन के दिन भाई और बहन की एक साथ अर्थी निकलने पर हर व्यक्ति की आंखें नम थीं।
ज्ञात हो कि वीरेन्द्र रावत अपनी बहन सिया रावत के साथ बाइक से मसूदपुर गांव किसी रिश्तेदार के यहां गमी में शामिल होने गए थे। रात करीब 10ः30 बजे जब वह वापस लौट रहे थे, तो लोहगढ़ तिराहे पर खड़े ट्रैक्टर-ट्रॉली से बाइक भिड़ गई। इसके चलते दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।
Published on:
08 Aug 2017 02:35 pm
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