
अच्छी बारिश और फसल के लिए मनाया जाता है भुजरिया पर्व
भोपाल. अच्छी बारिश, फसल एवं सुख समृद्धि की कामना के लिए रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरिया पर्व मनाया जाता है। इस दिन जल स्त्रोतों में गेहूं के पौधों का विसर्जन किया जाता है। शीतलदास की बगिया स्थित बड़ा तालाब एवं छोटे तालाब किनारे खटलापुरा मंदिर में भुजरियों का विसर्जन किया जाता है। खजूरी सड़क निवासी प्रेमबाइ सेन ने बताया कि सावन के महीने की अष्टमी और नवमीं को छोटी-छोटी बांस की टोकरियों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या जौं के दाने बोए जाते हैं। इसके बाद इन्हें रोजाना पानी दिया जाता है।
सावन के महीने में इन भुजरियों को झूला देने का रिवाज भी है। तकरीबन एक सप्ताह में ये अन्न उग आता है जिन्हें भुजरियां कहा जाता है। इन भुजरियों की पूजा अर्चना की जाती है एवं कामना की जाती है कि इस साल बारिश बेहतर हो जिससे अच्छी फसल मिल सके। श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। रक्षाबंधन के दूसरे दिन इन्हें एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद देते हैं। इन भुजरियों को एक दूसरे के कान में लगाया जाता है। बुजुर्गों के मुताबिक ये भुजरिया नई फसल का प्रतीक है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाएं इन टोकरियों को सिर पर रखकर जल स्त्रोतों में विसर्जन के लिए ले जाती हैं।
नवाबी दौर से भुजरिया पर्व की खास पहचान
भोपाल में भुजरिया पर्व नवाबी काल से खासतौर से मनाया जा रहा है। इस भुजरिया उत्सव की शुरुआत सुल्तानजहां बेगम ने की थी। नूरमहल निवासी ७५ वर्षीय मो. रफीक खान के पास इस संबंध में कुछ पुराने लेख हैं, जिनमें बताया गया है कि वर्ष १९३५ में राजधानी में सूखा पड़ा था। बड़ा तालाब तकरीबन सूख गया था।
उस दौर में पानी की आपूर्ति बड़ा तालाब से ही होती थी। इस समस्या के समाधान के लिए रियासत के वजीर ने किन्नरों के गुरु को बुलवाया और इसका उपाय पूछा। कहा जाता है कि गुरु ने बेगम की चुनरी मंगवाई और उसे गीला कर महल के बाहर लटका दिया और कहा कि जब तक ये चुनरी गीली रहेगी तक तक भोपाल में बारिश होती रहेगी।
बताते हैं कि इसके बाद झमाझम बारिश शुरू हो गई और हफ्ते भर में इतना पानी गिर गया कि बाढ़ का खतरा मंडराने लगा। इसके बाद गुरु के आदेश पर चुनरी को सुखाना शुरू किया गया और धीरे-धीरे बारिश का दौर थम गया। इसके बाद से राजधानी में भुजरिया महोत्सव धूमधाम से मनाया जाने लगा।
धूमधाम से निकलता है जुलूस
रक्षाबंधन के बाद हर साल राजधानी में किन्नर भुजरिया जुलूस निकालते हैं। यह परंपरा नवाबी शासन के समय से चली आ रही है। जुलूस निकालने के लिए इनको अनुमति भी प्राप्त है। जुलूस मंगलवारा, बुधवारा, तलैया, चौक बाजार, पीरगेट, रायल मार्केट होते हुए लालघाटी पहुंचता है, जहां भुजरियों का विसर्जन होता है। बुधवारा किन्नर ग्रुप की नायक पूजा ने बताया कि राखी के बाद भुजरिया मनाने के लिए नवाब ने लाइसेंस दिया था, जो आज भी हमारे पास है। इस दिन हम सज-धज कर बाजार में निकलते हैं, जिसमें शहरवासी शामिल होते हैं।
जुलूस में शामिल होने के लिए प्रदेश के भोपाल, इटारसी, गुना, इन्दौर, उज्जैन तथा अन्य शहरों के किन्नर भी आते हैं। जूलूस में मुख्य किन्नर सिर पर भुजरिया रखकर आगे चलते थे। वहीं, साथी किन्नर नाच-गाकर भुजरिया एकदूसरे को देते हुए जश्न मनाते हैं। इन्हें देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है।
इन क्षेत्रों में रहती है पर्व की धूम
भुजरिया पर्व अब पूरे भोपाल में मनता है। द्वारका नगर, छोला, निशातपुरा आदि क्षेत्रों में लोग रैली निकालकर गाजेबाजे के साथ झूमते-नाचते इस पर्व को मनाते हैं। हरेक एक- दूसरे को भुजरिया देकर गले मिलते हैं। देर शाम तक शहर के कार्यालयों, सार्वजानिक स्थानों पर यही क्रम चलता रहता है। अब तो मोबाइल युग में सोशल मीडिया पर संदेशों और चित्रों के माध्यम से भुजरिया की बधाईयां दी जाने लगी हैं।
Published on:
23 Aug 2018 05:02 pm
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