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खुसरो के टूटे पखावज से हुआ तबले का जन्म

भारत भवन में चल रहे दिनमान समारोह में हुईं चार प्रस्तुतियां

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खुसरो के टूटे पखावज से हुआ तबले का जन्म

भोपाल। भारत भवन में चल रहे दिनमान समारोह की शाम नवोदित कलाकारों की संगीतमय प्रस्तुति के नाम रही। पहली प्रस्तुति बनारस घराने के बांसुरी वादक भास्कर दास और शहर के संतूर वादक सत्येन्द्र सिंह सोलंकी की जुगलबंदी से हुई। उन्होंने प्रस्तुति के लिए राग किरवानी का चयन किया। इसमें उन्होंने रूपक ताल और तीन ताल की बंदिश पेश कीं। अगली प्रस्तुति अनुजा बोरुड़े और गार्गी शेजवल की पखावज जुगलबंदी रही। उन्होंने ताल चौपाल से अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की। इसके बाद अलग-अलग सात परन और रेला पेश किया।

इसके बाद उन्होंने जुगलबंदी में उठान, सात परन, रेला, साधारण चक्करदार और फरमाइशी चक्करदार पेश किया। इसके बाद रेला में पखावज पर सवाल-जवाब किए। चक्कदार की जुगलबंदी से कला रसीको को मंत्रमुग्ध कर अपनी प्रस्तुति का समापन किया।

पहली बार दी साथ प्रस्तुति

तीसरी प्रस्तुति में कलकत्ता की सहाना बैनर्जी और हल्दवानी के स्मित तिवारी की सितार और सरोद जुगलबंदी हुई। उन्होंने ऋतु प्रधान राग मियां मल्हार का चयन किया। इसमें उन्होंने तीन ताल में विलंबित और द्रुत की दो कंपोजिशन सुनाई। अंत में फारुख लतीफ और सरवर हुसैन ने सारंगी जुगलबंदी में राग मालकौंस में विलंबित एक ताल की बंदिश पेश की। इसके बाद इसी राग में द्रुत तीन ताल की बंदिश के जरिए सारंगी के आते जाते सुरों के साथ खूबसूरत सवाल जवाब किए।

वाद्य यंत्रों में ईरान से लेकर पर्शिया तक की छाप

इस मौके पर पत्रिका प्लस ने कार्यक्रम में आए कलाकारों से वाद्य यंत्रों के बारे में बात की। कलाकारों ने बताया कि भारतीय वाद्य यंत्रों में मुगल दौर में कई बदलाव आए।
सितार - सितार वादक सहाना के अनुसार ये भारत के प्राचीन वाद्य यंत्रों में से एक है। ईरान के तीन तार का वाद्य यंत्र शहादा 12वीं शताब्दी में भारत में आया। शहादा और वीणा से मिलकर सितार को नया स्वरूप मिला। ये प्राचीन त्रितंत्री वीणा का विकसित रूप है। तंत्री या तारों के अलावा इसमें घुड़च, तरब के तार तथा सारिकाएं होती हैं। इसमें पहली लेयर में सात और दूसरी में 13 तार होते हैं। इसके सैनी घराना, इटावा और मैहर घराना प्रमुख घराने हैं।

सरोद - सरोद वादक स्मित के अनुसार ये अफगान के रबाब का मॉर्डन रूप है। जो स्वर और औद से मिलकर बना है। 13 शताब्दी में इसमें काफी बदलाव आए। उस्ताद अलाउद्दीन खां ने भी इसमें परिवर्तन किए। पहले इसके नीचले हिस्से में लकड़ी का ड्रम होता था, उन्होंने इस पर बकरी की खाल चढ़ाई। सरोद के स्वरों में अनोखी गंभीरता होती है। सैनी, मैहर और शाहजहांपुर घराने सरोद के प्रमुख घराने हैं।

पखावज - पखावज वाद अनुजा बोरुडे के अनुसार पखावज हमारे देश का अत्यंत प्राचीन वाद्य है। किवदंती है कि इसका निर्माण ब्रह या विष्णु ने किया है। गणेश जी ने इसे सबसे पहले बजाया था। इसे आद्य वाद्य भी कहा जाता है। पहले इसका इस्तेमाल सिर्फ मंदिरों में किया जाता था। संगीतकार इसे मंदिर से आम जनता के बीच लाए। फिर इसे ध्रुपद गायन के साथ जोडा गया। कुदौसिन घराना, नाना साहब पानसे घराना और नातेद्वारा घराना प्रमुख हैं।

संतूर - संतूर वादक सत्येन्द्र सिंह सोलंकी के अनुसार संतूर एक कश्मीरी वाद्य यंत्र है। पहले इसका उपयोग कश्मीर के परंपरागत गायन के साथ सिर्फ एक वाद्य यंत्र के रूप में किया जाता था। संतूर का भारतीय नाम शततंत्री वीणा यानी सौ तारों वाली वीणा है जिसे बाद में फ़ारसी भाषा से संतूर नाम मिला। संतूर की उत्पत्ती लगभग 1800 वर्षों से भी पूर्व ईरान में मानी जाती है बाद में यह एशिया के कई अन्य देशों में प्रचलित हुआ जिन्होंने अपनी-अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार इसके रूप में परिवर्तन किए। पंडित शिव शर्मा व पंडित भजन सोपोरी ने इसे नए आयाम दिए।

तबला - तबला वादक रामेन्द्र सिंह सोलंकी के अनुसार तबला के जन्म पखावज से हुआ है। इसे राजस्व वाद्य भी कहा जाता है। कहा जाता है कि अमीर खुसरो पखावज बजा रहे थे। उसी समय यह दो टुकड़ों में टूट गया। तब उन्होंने इन टुकड़ों को बजाने की कोशिश की। इस प्रकार तबले का जन्म हुआ। अजराड़ा, बननारस और दिल्ली घराना प्रमुख है।
सारंगी - सारंगी वादक फारूख लतीफ के अनुसार सारंगी भारतीय के प्राचीन वाद्य यंत्र में से एक है। सारंगी में प्राचीन काल से आज तक कोई बदलाव नहीं आए। सारंगी को गले के काफी करीब माना जाता है। ग्वालियर, पानीपत और झज्जर घराना इसके प्रमुख घरानों में से एक है। प्राचीन काल में सारंगी घुमक्कड़ जातियों का वाद्य था। इसका प्राचीन नाम सारिंदा था, जो कालांतर में सारंगी हुआ। यह हिन्दी के सौ और रंग शब्दों से मिलकर बना भी माना जाता है।