
भाजपा का ये गढ़ ढहने के कगार पर!बड़े पेंच में फंसी MP की ये खास सीट
भोपाल। मध्यप्रदेश में भाजपा की करीब 4 ऐसी लोकसभा सीट हैं, जिन पर पिछले 3 से 4 दशकों से भाजपा का कब्जा बरकरार है। इन्हीं सब के चलते ये सीटें अब भाजपा के किले का रूप ले चुकीं हैं।
वहीं इन सीटों पर जीत को लेकर भाजपा हमेशा काफी आश्वस्त रही है। लेकिन इन्हीं में से एक सीट जो भाजपा की वीआइपी सीट भी कहलाती है, वह इस बार पेंच में आती दिख रही है। जिसके चलते राजनीतिक हल्कों में इन दिनों ये चर्चा बनी हुई है, कि इस बार भाजपा का ये गढ़ ढह सकता है।
दरअसल मध्यप्रदेश में इंदौर, भोपाल, विदिशा और भिंड ऐसी सीटें हैं, जो लंबे अरसे से भाजपा का गढ़ बनी हुई हैं। लगातार जीतों के चलते ये सीटें भाजपा के लिए काफी आसान मानी जाती हैं। वहीं इस बार इनमें से एक सीट को लेकर भाजपा में ही बवाल पैदा होता दिख रहा है, जिसके कारण इस किले में इस बार सेंध लगना तय माना जा रहा है।
यह सीट कोई और नहीं बल्कि भाजपा की वीआइपी सीट है। जहां करीब तीन दशकों से भाजपा का कब्जा बना हुआ है। पूर्व में कांग्रेस की रही इस सीट पर 1989 से काबिज हुई भाजपा ने अब तक इस सीट पर हार का मुंह नहीं देखा है।
लेकिन इस बार चुनावों में जो समीकरण बनते दिख रहे हैं(यानि स्थितियों में बदलाव नहीं हुआ तो), वो कहीं न कहीं इस सीट के भाजपा के हाथ से निकल जाने की ओर इशारा करते दिख रहे हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं भाजपा की वीआइपी सीट भोपाल की जो रीब 30 वर्षों से भाजपा के कब्जे में बनी हुई है।
ये खड़ी हो रही है परेशानी...
भोपाल वीआइपी सीट पर इस बार भाजपा के कई दिग्गज नेता लोकसभा चुनाव 2019 का टिकट पाने की कोशिश में जुटे हुए हैं, ऐसे में माना जा रहा है कि जिसे भी यहां से टिकट नहीं मिला वहीं भाजपा के लिए बगावती मोड में जा सकता है। जिससे भाजपा को काफी नुकसान के साथ ही अपने इस किले से हाथ भी धोना पड़ सकता है।
भाजपा के इन कद्दावरों ने ठोकी ताल...
दरअसल इस बार भोपाल से पूर्व सीएम बाबूलाल गौर सहित मेयर आलोक शर्मा, वर्तमान सांसद आलोक संजर व पूर्व मंत्री उमा शंकर गुप्ता ने दावेदारी दिखाई है। जानकारो के अनुसार ऐसे में सीट एक ही होने से यदि किसी एक को टिकट दे भी दिया जाता है तो बाकि तीन उसके विरोध में आ सकते है या उम्मीदवार को वोटिंग में नुकसान पहुंचा सकते हैं।
जाने इन दिग्गज नेताओं को...
1. बाबूलाल गौर : मध्यप्रदेश भाजपा के दिग्गज नेता बाबूलाल गौर ने भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा कुछ समय पहले ही जाहिर की है। इतना ही नहीं, बाबूलाल गौर ने ये भी कहा कि 10 बार विधानसभा देखी है, अब दिल्ली देखने की इच्छा है।
भले ही पूर्व सीएम बाबूलाल गौर ने ये भी स्वीकार किया है कि भले ही वे खुद को भोपाल लोकसभा सीट से मजबूत दावेदार समझते हैं, लेकिन पार्टी जो फैसला करेगी, वो हमें मान्य है। गौर ने चेतावनी भी दी है कि अगर टिकट नहीं दिया तो ये लोकसभा सीट जीतने में बीजेपी को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
2. आलोक संजर : वे भारतीय जनता पार्टी से भारतीय संसद के सदस्य हैं और मोदी सरकार के तहत भोपाल निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय आम चुनाव 2014 जीते हैं।
3. मेयर आलोक शर्मा: भाजपा चुनाव समिति की पिछले दिनों भोपाल में हुई बैठक में आलोक शर्मा ने भी भोपाल से लोकसभा का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की है।
वे वर्तमान में भोपाल के मेयर हैं। वहीं सूत्र ये भी कहते है कि उनके पीछे भाजपा के कई बड़े नेताओं का वरदहस्त भी है। जिसके चलते वे भी एक मजबूत उम्मीदवार के तौर पर इस रैस में शामिल हैं।
4. पूर्व मंत्री उमा शंकर गुप्ता: अभी कुछ दिन पहले ही पूर्व मंत्री गुप्ता ने पूर्व सीएम गौर से मुलाकात कर भोपाल से किसी लोकल कैंडिडेट खड़ा करने की भाजपा से मांग की थी। ऐसे में ये लगातार कयास चल रहे हैं कि वे भी चुनाव लड़ने की इस रेस में शामिल हैं।
भाजपा को बड़ा नुकसान!
राजनीति के जानकार डीके शर्मा की मानें तो एक ओर जहां विधानसभा चुनावों में नाराज रहे भाजपा के नेता अब लोकसभा में भी भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं एक ही जगह से कई दिग्गज नेताओं द्वारा टिकट मांगा जाना भी भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।
अब देखना ये है कि इन सबको भाजपा संतुष्ट कर अपने खेमे में जोड़कर कैसे रख पाती है। क्योंकि यदि ये भाजपा से टूटे को भाजपा को ही नुकसान पहुंचाएंगे।
जानकारों की मानें तो भोपाल में बीजेपी के किले को गिराना आसान काम तो नहीं है, लेकिन इस वक्त सियासी हालात बदले हुए हैं, राज्य में लंबे शासन के बाद भाजपा का राज खत्म हो गया है तो वहीं कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने के बाद आत्मविश्वास से भरी हुई है।
ऐसे में क्या एक बार फिर से भोपाल की जनता कमल पर बटन दबाएगी या फिर कुछ चौंकाने वाले नतीजे हमें देखने को मिलेंगे, ये देखने वाली बात होगी। लेकिन एक बात तय मानी जा रही है कि यदि भाजपा में बगावत हुई तो उसे काफी नुकसान उठाना पड़ेगा।
सामने भी होंगे कांग्रेस के दिग्गज...
वहीं दूसरी ओर ये भी चर्चा है कि इस बार दिग्विजय सिंह भोपाल से कांग्रेस के प्रत्याशी हो सकते हैं। ऐसे में जहां भाजपा को एक साथ मिलकर भी उन्हें हराने में पसीना आ सकता है। वहीं भाजपा की ये फूट कहीं न कहीं कांग्रेस को उसके किले में सेंध लगाने का रास्ता दे सकती है।
भोपाल का लोकसभा इतिहास...
भोपाल सीट का इतिहास शुरुआत में कांग्रेस समर्थित रहा लेकिन करीब ढाई दशक से भारतीय जनता पार्टी का यहां कब्जा है। 1989 के बाद तो कांग्रेस इस सीट से गायब सी हो चुकी है और उसकी हार का अंतर भी लाख से नीचे कभी नहीं रहा।
जानकारी के अनुसार भोपाल में पहले लोकसभा चुनाव में दो सीट थीं जिन्हें रायसेन और सीहोर के नाम से जाना जाता था। तब सीहोर सीट से कांग्रेस के सैयद उल्लाह राजमी ने उद्धवदास मेहता को शिकस्त दी थी तो रायसेन सीट से कांग्रेस के चतुरनारायण मालवीय ने निर्दलीय प्रत्याशी शंकर सिंह ठाकुर को मात देकर पहला लोकसभा चुनाव जीता था।
इसके बाद 1957 भोपाल की एक सीट हो गई जिसमें पहली बार मैमूना सुल्तान ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया और वे हिंदू महासभा के हरदयाल देवगांव को हराकर सांसद बनी।
इसके बाद वो 1962 में दोबारा हिंदू महासभा के ओमप्रकाश को हराकर लोकसभा पहुंची।1967 में भारतीय जनसंघ ने अपने प्रत्याशी उतारे और भोपाल सीट पर पहली बार में कब्जा जमा लिया।
इस जीत को भारतीय जनसंघ 1971 के अगले चुनाव में बरकरार नहीं रख सकी और कांग्रेस नेता और देश के पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने यहां शानदार जीत दर्ज की।
इसके बाद 1977 में यहां पर भारतीय लोकदल के नेता आरिफ बेग ने शंकरदयाल शर्मा को हरा दिया। 1980 में फिर से इस सीट पर शंकरदयाल शर्मा ने कब्जा किया और आरिफ बेग को हराया।
1984 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने सीट पर कब्जा बनाए रखा और केएन प्रधान यहां से एमपी बने। साल 1989 में कांग्रेस की इस सीट को सबसे पहले पूर्व मुख्य सचिव रहे सुशीलचंद्र वर्मा ने भाजपा के कब्जे की।
इसके बाद वे लगातार चार बार 1998 तक इस सीट से सांसद रहे। इसके बाद 1999 में भाजपा नेत्री उमा भारती और 2004 और 2009 में कैलाश जोशी ने यहां जीत दर्ज की और साल 2014 के चुनाव में यहां से आलोक संजर सांसद बने।
Updated on:
19 Mar 2019 04:06 pm
Published on:
19 Mar 2019 03:41 pm
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