
BJP will not show black flags to the chief minister
आलोक पण्ड्या, भोपाल. प्रदेश में सत्ता गंवाने के साइड इफेक्ट भाजपा में नजर आने लगे हैं। पार्टी को इस बार चंदा जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आजीवन सहयोग निधि के नाम पर ली जाने वाली इस राशि का लक्ष्य 11 करोड़ रुपए है, लेकिन अभी तक बमुश्किल 60 लाख रुपए ही जमा हुए हैं। जबकि, सत्ता में रहने के दौरान पार्टी मार्च के अंत तक इस निधि का लक्ष्य पूरा कर लेती थी। इस बार लक्ष्य से लगभग 94 प्रतिशत कम राशि पार्टी के खाते में आई है।
- सांसद-विधायकों ने नहीं दिया चंदा
सांसद-विधायकों को आजीवन सहयोग निधि में हर साल 10000 रुपए जमा करना होता है। इस हिसाब से देखा जाए तो मध्यप्रदेश के 26 सांसद, 109 विधायक और आठ राज्यसभा सदस्यों से लगभग 15 लाख रुपए एकत्रित होना चाहिए, लेकिन अभी तक कई सांसदों-विधायकों ने यह राशि जमा नहीं कराई है।
- आनाकानी कर रहे दानदाता
भाजपा अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों से भी आजीवन सहयोग निधि जुटाती है। इस बार ये लोग भी आनाकानी कर रहे हैं। पार्टी ने आजीवन सहयोग निधि के लिए हर जिले में एक टीम बनाई है। जिसे 31 मार्च से पहले अपने जिले का लक्ष्य पूरा करना है। 2018 में प्रदेश संगठन को लगभग 10 करोड़ और 2017 में लगभग नौ करोड़ रुपए आजीवन सहयोग निधि के रूप में मिले थे।
- कम चंदा तो होगी खर्चों में कटौती
सरकार जाने के बाद आर्थिक रूप से कमजोर हुई भाजपा को राशि कम एकत्रित होने से आर्थिक तंगहाली का सामना करना पड़ सकता है। पिछले दिनों राजधानी में पदाधिकारियों की एक बैठक में भाजपा संगठन महामंत्री रामलाल ने साफ कहा था कि अब सरकार नहीं है, इसलिए संगठन के कार्यक्रमों का खर्चा विभिन्न मोर्चें और जिला कार्यकारिणी की टीम स्वयं निकाले। आजीवन सहयोग निधि लक्ष्य से कम हुई तो तय है कि संगठन कंजूसी से काम चलाएगा।
- क्या है आजीवन सहयोग निधि
आजीवन सहयोग निधि की शुरुआत कुशाभाऊ ठाकरे ने की थी। तब विपक्ष में बैठी भाजपा को संगठन चलाने के लिए पैसे की जरूरत थी। ठाकरे ने पार्टी के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और पार्टी की विचारधारा से सहमति रखने वालों से आजीवन सहयोग निधि लेकर संगठन चलाने की व्यवस्था की। मध्यप्रदेश से इसकी शुरुआत हुई और बाद में पूरे देश में यह व्यवस्था लागू की गई। अब तक आजीवन सहयोग निधि के मामले में मध्यप्रदेश देश में अव्वल ही रहा है।
- कांग्रेस में सुधरे हालात
प्रदेश में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस कार्यालय में चमक आ गई है। 15 साल के वनवास के दौरान पीसीसी ने सबसे बुरे आर्थिक हालात का सामना किया है। प्रवक्ता अपनी जेब के पैसों से आगंतुकों को चाय पिलाते थे। यहां तक कि रोजाना का खर्च चलाने के लिए जवाहर भवन की दुकानों तक को गिरवी रखना पड़ा था, लेकिन अब हालात बदले-बदले दिख रहे हैं। कार्यालय में नया फर्नीचर आ गया है। कार्यालय के सामने की उबड़-खाबड़ जमीन पर टाइल्स लग गए हैं। चाय पिलाने वालों की संख्या में इजाफा हो गया है। पीसीसी में सुबह से शाम तक चाय-कॉफी के दौर चलने लगे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पीसीसी की माली हालत में बहुत सुधार हो गया है। पार्टी को किसने कितना फंड दिया इसका ब्योरा अभी नहीं है, लेकिन ये तय है कि पार्टी को चंदा देने वालों की संख्या बढ़ गई है।
आजीवन सहयोग निधि एकत्रित करने का काम जारी है। 31 मार्च से पहले हम इसे अभियान के रूप में करेंगे। इस बार कम धन एकत्रित हुआ है, लेकिन हमें विश्वास है कि हम अपना टारगेट पूरा कर लेंगे।
- कृष्ण मुरारी मोघे, प्रभारी, आजीवन सहयोग निधि, भाजपा
Published on:
08 Mar 2019 05:19 am
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