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रीवा के इतिहास से मुश्किल में BJP, 30 साल से नहीं हुई मौजूदा सांसद की वापसी

रीवा के इतिहास से मुश्किल में भाजपा, तीस साल से नहीं हुई मौजूदा सांसद की वापसी - आठ चुनाव में लगातार नहीं जीता मौजूदा सांसद    

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भोपाल

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Arun Tiwari

May 03, 2019

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भोपाल : रीवा का इतिहास भाजपा को डरा सकता है। विंध्य की राजनीति के केंद्र रीवा के इतिहास को देखकर भाजपा आशंकित तो कांग्रेस खुश हो सकती है। पिछले तीस सालों में रीवा की जनता ने अपने सांसद को लगातार दोबारा चुनाव जीतने का मौका नहीं दिया।

यहां की जनता हर बार नए चेहरे को चुनकर लोकसभा में भेजती है। पिछले आठ लोकसभा चुनाव के नतीजे भी कुछ इसी तरह के रहे हैं। यहां की जनता ने कांग्रेस,भाजपा के साथ बसपा को भी खूब मौका दिया है।

भाजपा ने यहां से मौजूदा सांसद जनार्दन मिश्रा को दोबारा टिकट दिया है। वहीं कांग्रेस ने सिद्धार्थ तिवारी को मैदान में उतारा है। जनार्दन इस बार इतिहास की इबारत को बदलने का दावा कर रहे हैं तो सिद्धार्थ को जनता के फैसले पर पूरा भरोसा है।

सिर्फ दो बार दिया दोबारा मौका :
रीवा की सियासत में दो बार ऐसा हुआ है जब किसी सांसद को यहां की जनता ने स्वीकार किया हो हालांकि ये बहुत पुरानी बात हो गई है। कांग्रेस के शिवदत्त उपाध्याय १९५७ और १९६२ में लगातार दो बार सांसद बने तो महाराजा मार्तण्ड सिंह १९७१, १९८० और १९८४ में यहां से चुनाव जीते हैं।

इसमें दिलचस्प बात ये है कि तीनों बार मार्तण्ड सिंह तीन अलग अलग चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़े हैं। पहली बार वे यूनाइटेड इंटर पार्लियामेंटरी ग्रुप से, दूसरी बार नर्दलीय और तीसरी बार किांग्रेस उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीते।

आठ चुनाव से रिपीट नहीं हुआ सांसद :

१९८९ में जनता पार्टी से यमुना प्रसाद शास्त्री ने यहां से चुनाव जीता। शास्त्री ने मार्तण्ड सिंह से यहां की लोकसभा सांसद की कुर्सी छीन ली। १९९१ में ये सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में चली गई। यहां से बसपा के भीम सिंह पटेल सांसद बने।

१९९६ में बसपा ने भीम सिंह पटेल की जगह बुद्धसेन पटेल को चुनाव लड़ाया। जनता ने फिर बसपा को चुना और बुद्धसेन पटेल सांसद बन गए। १९९८ में भाजपा के चंद्रमणि त्रिपाठी यहां से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए। १९९९ में विंध्य के सफेद शेर कहे जाने वाले श्रीनिवास तिवारी के पुत्र सुंदरलाल तिवारी ने ये सीट जीतकर कांग्रेस की झोली में डाल दी।

२००४ में भाजपा के चंद्रमणि त्रिपाठी को जनता ने पांच साल के अंतर के बाद फिर से मौका दे दिया। २००९ में बसपा के देवराज सिंह पटेल सांसद बने। २०१४ में भाजपा के जनार्दन मिश्रा ने इस सीट पर फिर से कमल खिला दिया।