2 जून 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

IISER Bhopal का कमाल, अब बाढ़ आएगी, सूखा पड़ेगा या घटेगा भू-जल.. हमें पहले ही पता चल जाएगा

IISER Bhopal : आइसर भोपाल मे तैयार किया 'अर्ली वार्निंग मॉडल...' बाढ़-सूखा, घटते भू-जल स्तर के पहले ही देगा संकेत, समय रहते हम कर सकेंगे तैयारी। AI और सैटेलाइट डेटा को जोड़कर पहचान होगी।

2 min read
Google source verification
IISER Bhopal

IISER Bhopal का कमाल (Photo Soure- Patrika)

IISER Bhopal : जलवायु परिवर्तन और जलसंकट के दौर में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आइसर) के वैज्ञानिकों ने अर्ली वार्निंग मॉडल विकसित करके कमाल कर दिखाया है। ये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और सैटेलाइट डेटा के आधार पर बाढ़, सूखा, भूजल में कमी के संकेत पहले ही पहचान लेगा।

मामले को लेकर वैज्ञानिक डॉ. सोमिल स्वर्णकार ने बताया, सैटेलाइट की सहायता से बारिश, नदी के जलस्तर, झीलों की स्थिति, भूजल स्टॉक की जानकारी जुटा रहे हैं। एआइ आंकड़ों का विश्लेषण कर जल संकट, मौसम का अनुमान लगाने में मदद कर रहा है। इससे समय रहते समस्या से निपटा जा सकेगा।

नदियों का प्राकृतिक स्वरूप भी बदल रहा

डॉ. स्वर्णकार ने आगे ये भी बताया कि, अध्ययनों में पता चला है कि, देश की कई नदियों का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बड़े बांध, जल प्रवाह नियंत्रण और अनियोजित विकास से नदियां लगातार असंतुलित होती जा रही हैं। जल प्रवाह पहले जैसा नहीं बचा है। इसका असर बाढ़ के पैटर्न, मिट्टी के कटाव, नदी तंत्र से जुड़े पर्यावरण पर पड़ रहा है। कई नदियां मानसून में उफन जाती हैं, कई में जलस्तर कम होता है।

झीलें और वेटलैंड भी अब खतरे में

सैटेलाइट आधारित अध्ययनों से यह भी पता चला कि कई शहरों की झीलें-वेटलैंड सिकुड़ रहे हैं। शहरीकरण व अतिक्रमण से प्राकृतिक जल स्रोतों का क्षेत्रफल घट रहा है। इसका सीधा असर भूजल रिचार्ज, शहरों के तापमान और पेयजल उपलधता पर पड़ रहा है। यदि इन प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में शहरी क्षेत्रों में जल संकट और गहरा सकता है।

लगातार असंतुलित हो रही नदियां

अध्ययनों पर गौर करें तो पता चलता है कि, देश की कई नदियों का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बड़े बांध, जल प्रवाह नियंत्रण और अनियोजित विकास से नदियां लगातार असंतुलित होती जा रही हैं। जल प्रवाह पहले जैसा नहीं बचा है। इसका असर बाढ़ के पैटर्न, मिट्टी के कटाव, नदी तंत्र से जुड़े पर्यावरण पर पड़ रहा है। कई नदियां मानसून में उफन जाती हैं, कई में जलस्तर कम होता है।

गहरा सकता है भारी जल संकट

अध्यनों के मुताबिक, कई शहरों की झीलें-वेटलैंड तेजी से सिकुड़ रहे हैं। शहरीकरण और अतिक्रमण से प्राकृतिक जल स्रोतों का क्षेत्रफल भी घटता जा रहा है। इसका सीधा असर भूजल रिचार्ज, शहरों के तापमान और पेयजल उपल-धता पर पड़ रहा है। अगर इन प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो आगामी सालों में शहरी इलाकों में जल संकट गहराने से रोक पाना बड़ी चुनौती बनकर सामने आएगा।