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चीता प्रोजेक्ट की First Anniversary पर जानिए वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं

इस एक साल में चीतों को लेकर केवल दुख की यानी चीतों की मौत की खबरों और भारत में टाइगर प्रोजेक्ट पर उठे सवालों ने हमें निराश किया। लेकिन नए चीता शावकों के जन्म की खुशियां भी मनाई हैं। आज इस आर्टिकल में हम आपको बता रहे हैं चीता स्टेट के एक साल के सफर पर वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं...

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चीता प्रोजेक्ट हर भारतीय के लिए गर्व की बात रही। चीता प्रोजेक्ट का नाम सुनते ही आम जन में यही चर्चा थी क्या है चीता प्रोजेक्ट, हर कोई इस बारे में जानना और पढ़ना चाहता था। आज भी हर कोई इस बारे में जानना या पढ़ना चाहता है। लेकिन...इससे भी ज्यादा मजेदार यह था कि आजाद भारत में पहली बार चीतों का आगमन होना था, भारत का जन-जन अपनी आंखों में एक सपना बुनने लगा था कि जल्द ही वे टीवी, मोबाइल और किताबों पर नजर आने वाले इन चीतों को करीब से देख सकेंगे। खासतौर पर वाइल्ड लाइफ के शौकीनों के लिए तो यह शानदार रोमांचक खबर थी...। हालांकि इस सपने को पूरा होने में फिलहाल समय है। आज इस आर्टिकल में हम आपको बता रहे हैं चीता स्टेट के एक साल के सफर पर वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं...

भारत में चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस 17 सितंबर 2022 को एमपी के कूनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य से की गई। यानि भारत का राज्य मप्र टाइगर स्टेट के साथ ही कई वाइल्ड एनिमल जैसे लेपर्ड, वुल्फ, वल्चर, क्रोकोडाइल स्टेट के नाम से भी जाना जाता था, लेकिन 17 सितंबर 2022 में मप्र ने एक और मुकाम हासिल किया और यह देश के 6ठे एनिमल स्टेट यानी चीता स्टेट के नाम से भी जाना जाने लगा। कूनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य या Kuno National Park भारत का पहला चीता अभयारण्य बना। गौरव के इस क्षण को 17 सितंबर रविवार को 1 साल पूरा हो जाएगा। यानी टाइगर स्टेट के रूप में मप्र अपना पहला जन्मदिन मनाएगा।

- चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत या कहें कि चीता प्रोजेक्ट के एक साल का यह दौर आसान नहीं रहा और भविष्य कैसा रहने वाला है यह कहना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन चीता एक्सपट्र्स की एक बात तो राहत देती है कि दक्षिण अफ्रीका में जब चीतों को बसाया गया तो 10 साल तक चीता प्रोजेक्ट विफल होता ही दिखा, लेकिन 11वें साल में एक्सपट्र्स को इस प्रोजेक्ट से उम्मीद मिली और चीता प्रोजेक्ट सफल हुआ।

- आपको बता दें कि भारत में चीता पुनर्वास परियोजना के लिए 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत की गई है।

- इस प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार ने 2021-22 से 2025-26 तक के लिए 38 करोड़ 70 लाख रुपए की राशि आवंटित की है।

- भारत में आखिरी बार चीता सन 1947 में देखा गया था और ये आखिरी स्थान भी मप्र ही था। मप्र के कोरिया वर्तमान में छत्तीसगढ़ जिले में ही देखा गया था।

- इसके बाद इस प्रजाति को सन 1952 में विलुप्त घोषित कर दिया गया।

- चीतों को भारत में फिर से बसाने के लिए 'भारत में अफ्रीकी चीता परिचय परियोजना' साल 2009 में शुरू की गई थी।

- भारत में चीता के आयात के लिए नामीबिया सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

- बता दें कि भारत में चीतों को बसाने के लिए श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क को सबसे उपयुक्त जगह माना गया था।

- भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों के चलते 17 सितंबर 2022 को भारत एक बार फिर चीतों की आबादी से आबाद हो गया।

- बता दें कि पीएम मोदी के नेतृत्व में मप्र प्रदेश सरकार की देखरेख में चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत 17 सितम्बर 2022 को की गई।

- आज से 12 महीने पहले भारत में चीता प्रोजेक्ट के तहत 20 चीते लाए गए।

- इनमें 12 चीते दक्षिण अफ्रीका नामीबिया से 18 फरवरी 2023 को तो इससे पहले 8 चीते को यहां लाकर बसाया गया था।

- इन चीतों को विशेष विमान से भारत लाया गया था।

- इस बीच नामीबिया से लाई गई मादा 5 साल की चीता साशा की 27 मार्च 2023 को की मौत हो गई।

- उसकी मौत का कारण किडनी का संक्रमण बताया गया।

- साशा की मौत के दिन ही एक खुशखबरी भी आई... 27 मार्च 2023 को नामीबिया से लाई गई चीता ज्वाला ने चार शावकों को जन्म दिया।

- साशा की मौत को एक महीना भी नहीं बीता था कि 6 साल के चीते उदय ने 23 अप्रैल को दम तोड़ दिया।

- इसके बाद 9 मई को मादा चीता दक्षा की मौत हो गई।

- दक्षा की मौत का कारण का कारण बना मेटिंग। मेटिंग के दौरान नर चीतों के हमले में वह घायल हुई और मौत की नींद सो गई।

- 27 मार्च को जन्मे 4 शावकों में से एक की मौत 22-23 मई को हुई थी, उसके बाद 25 मई को दो अन्य शावकों ने भी दम तोड़ दिया।

- इसके बाद चीता तेजस की मौत की खबर फिर से मीडिया की सुर्खियां बनीं। 11 जुलाई को हुई तेजस की मौत के बाद चीता प्रोजेक्ट पर सवाल उठाना शुरू हो गए।

- दो दिन बाद ही 14 जुलाई को दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीता सूरज ने दम तोड़ा।

- 2 अगस्त को एक बार फिर एक और चीते की मौत की खबर आई। इसका नाम था टिब्लिसी (धात्री)। धात्री कुनो में जंगल में मुक्त विचरण करने वाले अंतिम दो चीतों में से एक थी और प्रोजेक्ट चीता के हिस्से के रूप में लाए गए चीतों में से मरने वाला छठा वयस्क चीता थी।

- इस तरह अब तक कुल 9 चीतों की मौत की खबरें न केवल सरकारों, अधिकारियों, जिम्मेदारों बल्कि हर आम जन के लिए निराशा का कारण बनीं।

- कूनो नेशनल पार्क में 6 वयस्क चीतों और 3 शावकों की मौत के बाद कुल 20 चीतों में से अब 14 वयस्क चीते और एक शावक बचा है। जो वर्तमान में 6 महीने का हो चुका है।

- आपको बता दें कि 27 मार्च 2023 को चीतों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ था, तो फिर वह थमा नहीं। 2 अगस्त 2023 तक 6 महीने में 9 चीतों की मौत हो गई।

- आपको बता दें कि चीतों की लगातार मौतों के कारण चीता प्रोजेक्ट के मप्र चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन तथा हेड जसबीर सिंह चौहान का तबादला तक किया गया।

- यानि चीतों की लगातार मौतें चीता प्रोजेक्ट को सवालों के घेरे में ले आईं। सरकारों की चिंता और चिंतन का सबब बन गईं।

- सवाल उठे कूनो ही क्यों? चीता प्रोजेक्ट का विकल्प और कहां? सरकारी लापरवाही? जिम्मेदारों, रक्षकों की लापरवाही?

- कई बुद्धिजीवी भी चीता प्रोजेक्ट की सफलता पर सवाल उठाते दिखे। लेकिन इन सवालों पर एक्सपट्र्स कहते हैं...

- दक्षिण अफ्रीका से कूनो नेशनल पार्क आए चीता मेटा पापुलेशन संस्था के विंसेंट वैन डेर मर्व कहते हैं कि चीता में स्वाभाविक रूप से मृत्यु दर ज्यादा होती है।

- वे बताते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में 41 फीसदी चीते जंगल में छोडऩे के 5 साल में ही मारे गए थे।

- चीता प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ही हमारे मन में बात थी कि हम अप्रैल 2023 तक 10 चीतों को सुरक्षित बचा पाएंगे।

- कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि कूनो के अलावा राजस्थान का मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान भी चीतों के लिए वैकल्पिक आवास हो सकता है। लेकिन जल्दबाजी में ऐसे निर्णय नहीं लिए जा सकते।

- लगातार होती मौतों पर एक्सपट्र्स का यह भी कहना था कि दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने 12 चीतों को भारत को देने के लिए 7 महीने का समय लगा लिया।

- इस दौरान चीतों को वहां भी कैद में रखा गया था, जब इन्हें भारत लाया गया तब भी ये कई महीनों तक कैद में रहे। इस तरह कुल 9 महीने उन्हें कैद में रहना पड़ा। इस कारण उनकी सेहत काफी प्रभावित हुई।

- कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भारत का पर्यावरण और दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया का पर्यावरण काफी डिफरेंट है। 75 साल पहले भारत में पाए जाने वाले चीते एशियाई थे, जबकि वर्तमान में भारत में दक्षिण अफ्रीका नामीबिया से चीतों को लाकर यहां बसाया जा रहा है। ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही। यदि प्रोजेक्ट सफल होता है, तो यह देश की सफलता होगी। लेकिन सफलता का यह रास्ता जरा भी आसान नहीं है।

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