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शहीद भवन : रंग-ए-स्मृति समारोह में नाटक ‘1226/7’ का मंचन

सरकारी सिस्टम के चंगुल में फंसा आम आदमी

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शहीद भवन : रंग-ए-स्मृति समारोह में नाटक '1226/7' का मंचन

भोपाल। शहीद भवन में सोमवार को नाटक 1226/7 का मंचन किया गया। जिसमें आम आदमी की समस्याएं, सरकारी सिस्टम से जूझती सच्चाई और दस्तावेजों में खड़ी होती विकास की इमारत को दिखाने की कोशिश की गई। इस नाटक को रंग निर्देशक शांति बद्र्धन दादा गुरु की स्मृति में कसौटी बैले एंड परफार्मिंग आट्र्स द्वारा आयोजित रंग-ए-शांति नाट्य समारोह के तहत किया गया। नाटक का निर्देशन विशाल चतुर्वेदी ने किया। लेखक मोहन राकेश की कहानी 'परमेश्वर का कुत्ता' पर केंद्रित यह नाटक प्रशासनिक व्यवस्था पर तंज कसता है। नाटक में आम आदमी की समस्याओं को मंच पर उतारा गया।

नाटक की कहानी

नाटक की शुरुआत आम आदमी साधूराम की एंट्री से होती है, जो कि जमीन के दस्तावेज निकलवाने के लिए कचहरी में अर्जी लगता है। उसकी अर्जी को नौ साल बीत चुके हैं। वह गरीब है इसलिए बाबू को रिश्वत नहीं दे सकता। वहीं उसके घर में दो जून की रोटी के फांके पड़े हुए हैं। कचहरी के चक्कर काट-काटकर वह परेशान हो जाता है। एक दिन उसका गुस्सा फूट पड़ता है। वह बाबू से बोलता है कि आप लोग सरकार के कुत्ते हो और मैं परमात्मा का कुत्ता हूं। यह बात सुनकर कलेक्टर उसे मिलने के लिए बुलाता है। कलेक्टर उसे एक वकील करने को कहता है। वकील भी साधुराम से रिश्वत मांगता है। वहीं नाटक के अंत में दिखाया कि वह अपनी जमीन के दस्तावेज नहीं निकलवा पता, जिसके कारण वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है।

साहिब बीबी और गुलाम को मिले थे चार फिल्मफेयर अवॉर्ड

भारत भवन में चले रहे एकाग्र महोत्सव में सोमवार को साहिब बीबी और ग़ुलाम का प्रदर्शन किया गया। गुरुदत्त द्वारा निर्मित और अबरार अलवी द्वारा निर्देशित 1962 की भारतीय हिन्दी फिल्म है। यह बिमल मित्रा द्वारा लिखी एक बंगाली उपन्यास शाहेब बीबी गोलाम पर आधारित है। ब्रिटिश राज के दौरान 19वीं शताब्दी के अंत तथा 20वीं शताब्दी की शुरुआत में बंगाल में जमींदारी और सामंतवाद के दुखद पतन की झलक है।

फिल्म एक कुलीन (साहिब) की एक सुंदर, अकेली पत्नी (बीबी) और एक कम आय दास (ग़ुलाम) के बीच एक आदर्शवादी दोस्ती को दर्शाने की कोशिश करती है। फिल्म का संगीत हेमंत कुमार और गीत शकील बदायूनी ने दिया है। फिल्म के मुख्य कलाकार गुरु दत्त, मीना कुमारी, रहमान, वहीदा रहमान और नज़ीर हुसैन थे। इस फिल्म को कुल चार फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाजा गया था।