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मूक बधिर गोरांशी बैडमिंटन में कर देती हैं सबकी बोलती बंद

दिव्यांग शटलर गोरांशी को मिलेगा वर्ष 2020 का एकलव्य पुरस्कार

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भोपाल. दिव्यांग शटलर गौरांशी शर्मा आज मिसाल बन गई हैं। वह नतो बोल सकती हैं और न ही सुन सकती हैं, लेकिन जब वह बैडमिंटन कोर्ट पर खेलती हैं तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है। गौरांशी को प्रदेश सरकार ने वर्ष 2020 के एकलव्य खेल पुरस्कार के लिए चुना है।

14 वर्षीय गौरांशी स्टेट से लेकर नेशनल प्रतियोगिताओं में अपने हुनर का लोहा मनवा चुकी हैं। बैडमिंटन चुनने को लेकर गौरांशी इशारों में बताती हैं कि जब वह पहली बार स्टेडियम गईं तो बॉक्सिंग और बास्केटबॉल देखा, लेकिन पसंद नहीं आया। इसलिए बैडमिंटन को चुना था। गौरांशी आने वाले सालों में देश के लिए ओलंपिक में खेलना चाहती है।

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अब तक की उपलब्धियां
- दूसरी वर्ल्ड यूथ डीफ चैंपियनशिप 2019 में भारत का प्रतिनिधित्व
- जमशेदपुर में जूनियर व सब जूनियर नेशनल एथलेटिक्स गेम्स ऑफ द डीफ में कांस्य पदक
- भोपाल में हुए नेशनल बैडमिंटन में चौथा स्थान, 12 स्टेट लेवल में टूर्नामेंट खेले।

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आसान नहीं होता सामान्य खिलाड़ियों के साथ
गौरांशी 7 साल की उम्र से बैडमिंटन खेल रही हैं। वे चीन के ताइपे में बीते साल हुई वर्ल्ड डीफ बैडमिंटन चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। मप्र बैडमिंटन अकादमी की चीफ कोच रश्मि मालवीय ने बताया कि गौरांशी के लिए सामान्य खिलाड़ियों के साथ खेलना आसान नहीं रहता। शुरू-शुरू में वह असहज महसूस करती थी। कई बार उसका हौसला बढ़ाने के लिए नेशनल-इंटरनेशनल खिलाड़ियों के वीडियो दिखाए।

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पाल में रहे अभिभावक
गौरांशी की तरह उनके माता-पिता भी मूकबधिर हैं। बेटी के सपनों को साकार करने के लिए पिता गौरव शर्मा और मां प्रीति शर्मा पांच साल भोपाल में ही रहे, ताकि बेटी अच्छे से ट्रेनिंग ले सके। दरअसल, वे यहां घूमने आए थे, तभी पता चला कि यहां बैडमिंटन अकादमी है। इसलिए यहीं रुक गए थे।