
डायनोसोर के अंडे को शिवलिंग समझ कर पूजते हैं, यही हमारी जागरुकता है
भोपाल। 49 बरस के प्रणय लाल ने अपनी आधी से कुछ ही कम उम्र यानी 22 साल एक किताब लिखने में गुजारे हैं। यह किताब है, इंडिका- ए डीप नैचुरल हिस्ट्री ऑफ द इंडियन सब कांटिनेंट। भारतीय उपमहाद्वीप के बनने और आज तक की शक्ल में पहुंचने की कहानी को कहती यह किताब धरती के कई भूगर्भीय रहस्य खोलती है। पेशे से बॉयो केमिस्ट प्रणय मानते हैं कि हमारे म्यूजियम मरे हुए हैं, उन्हें जिंदा करने की जरूरत है ताकि वहां रखा ज्ञान लोगों तक पहुंच सके। प्रणय लाल से पत्रिका ने बात की।
प्रश्न- आपकी किताब क्या कहती है?
प्रणय- इस किताब का जन्म मेरी बचपन की जिज्ञासाओं से हुआ है। जैसे नदिया और पहाड़ कैसे बने? महाबलेश्वर के पास की नदी अरब सागर में ना जाकर बंगाल की खाड़ी में क्यों गिरती है। जब शिक्षकों से इन सवालों के जवाब नहीं मिले तो मैं शोध में जुट गया। देश भर में घूमा, भूगर्भ विज्ञानियों, पुरातत्ववेत्ताओं और फॉसिल विज्ञानियों से मिलता गया। जो भी मिला उसे लिखता गया, तो भारतीय उपमहाद्वीप के बनने की कहानी बन गई। सत्तर करोड़ साल पहले भारत कहां था, कौनसे जीव जंतु क्यों थे, यह सब इस किताब में है। सभी को जनना चाहिए कि कभी आस्टे्रलिया भारत से चिपका हुआ था तो वहीं मेडागास्कर केरल और गुजरात के बीच का हिस्सा था।
प्रश्न- नर्र्मदा नदी को पुरासंपदा का खजाना क्यों कहा जाता है?
प्रणय- देखिए, नर्मदा के बेल्ट में सबसे ज्यादा फासिल मिलते हैं। लेकिन एक भी संग्रहालय यहां पर नहीं है,यह दुर्भाग्य है। सिर्फ 6 हजार पेड़ लगाने से नर्मदा बचाने की बात हो रही है। लेकिन वह संरक्षित नहीं किया जा रहा है जो नर्मदा बेल्ट के आस-पास गर्भ में बिखरा पड़ा है। जिसमें मानव के इतिहास की कहानिंया छिपी पड़ी है।
प्रश्न- डायनासोर पुराविज्ञान का सबसे रोचक हिस्सा है, क्या इनके फॉसिल का सही संरक्षण हो रहा है?
प्रणय- मध्यप्रदेश में नर्मदा बेल्ट में डायनोसार के फॉसिल का भंडार है। लेकिन दुर्भाग्य से हम डायनोसार के फॉसिल का भी सही संरक्षण नहीं कर रहे। धार में तो डायनासोर के अंडे के फॉसिल को शिवलिंग मानकर पूजा रहा है तो कहीं सड़क निर्माण में उपयोग किया जा रहा है।
प्रश्न- क्या वर्तमान में बच्चों को यह सब ठीक से पढ़ाया जा रहा है?
प्रणय- नहीं, हम वर्तमात शिक्षण व्यवस्था में तो बच्चों की उत्सुकता को मार रहे हैं। पढ़ कर डिग्रियां तो हांसिल कर रहे हैं, लेकिन खोज की प्रवृत्ति खत्म हो रही है। क्रिकेट और बॉलीवुड को छोड़कर देश में कोई विषय नहीं जिस पर बहस लोग करते हों। स्कूलों में क्यों शब्द तक पहुंचने की बच्चों में आदत डालने का काम होना चाहिए। बच्चों को स्कूल से बाहर लाना चाहिए। अगर नागरिक शास्त्र पढ़ाना है तो फिर विधानसभा, लोकसभा में बच्चों को क्यों नहीं ले जाया जाए।
प्रश्न- क्या पुराविज्ञान के लिए देश के म्यूजियम सही है?
प्रणय- आज म्यूजियम मरी हुई स्थिति में है। वहां बेशकीमती सामान तो है, लेकिन उसे बताने और समझाने वाले लोग नहीं है। वस्तु रखने से कुछ नहीं होगा उसे ऐसे बताया जाए कि बच्चे वहां पहुंचे और समझे।
Published on:
14 Jan 2019 09:44 am
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