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स्पेशल स्टोरी: डॉ. प्रभाकर ने तीसरी पीढ़ी तक पहुंचाया ग्वालियर घराने का संगीत

डॉ. प्रभाकर गोहदकर ऐसे संगीतज्ञों में जाने जाते हैं,जिन्होंने ग्वालियर घराने की संगीत विरासत को तीन पीढिय़ों तक पहुंचाया।

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Shyamendra Parihar

Oct 31, 2015

ग्वालियर। संगीत घरानों में ग्वालियर घराने का अहम स्थान है। जिसे सैकड़ों संगीतज्ञों ने अपनी मेहनत से सींचा है। न केवल गढ़ा है, बल्कि पीढि़यों तक इसे पहुंचाया भी है। एेसे ही कलाकार हैं डॉ. प्रभाकर गोहदकर जिन्होंने ग्वालियर घराने की सेवा वर्षों तक की और अपनी पुत्री डॉ. स्मिता सहस्त्रबुद्धे और पोती भाग्यश्री को संगीत की शिक्षा दी।

नाना से ली थी प्रारंभिक शिक्षा
डॉ. प्रभाकर बताते हैं कि उनके नाना गोपालराव तीर्थंकार थे। इन्हीं से उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी। कुछ समय गंगाधर भागवत से भी संगीत सिखा। इसके बाद मैं चर्तुसंगीत महाविद्यालय जनकगंज में संगीत सीखने जाता था। जहां बाला साहब पूंछवाले से संगीत सीखा करता था। कभी-कभी उनके घर भी जाया करता था। जहां उनके पिता राजा भैया पूंछवाले से संगीत की बारीकियां सीखीं।

यह सिलसिला 1942 से 1950 तक चला। इसके बाद मैंने 51 में माधव संगीत महाविद्यालय में दाखिला ले लिया। जहां से 1954 में संगीत निपुण की डिग्री ली। उस वक्त संगीत निपुण के नाम से डिग्री मिलती थी। जब मैंने ये परीक्षा पास की थी, तब पूरे मध्य भारत में मैं पहले स्थान पर आया था।

डॉ. गोहदकर ने बताया कि लंबे वक्त तक शिक्षा लेने के बाद वे पीएससी परीक्षा में बैठे। जहां से उनका चयन 1968 में रीवा महाविद्यालय में संगीत के प्राध्यापक के तौर पर हो गया। वे 1995 तक वहां रहे। और ग्वालियर घराने के संगीत से युवाओं को नवाजा और 16 स्टूडेंट्स को पीएचडी कराई।

गुरु पर लिखी किताब
अपने गुरु बाला साहब पूंछवाले और उनके पिता के संगीत पर डॉ. गोहदकर किताब लिख चुके हैं। राजा भैया पूंछवाले स्वरांग दर्शन शीर्षक से लिखी गई किताब में ग्वालियर घराने के टप्पा, अष्टपदी, तराने और ख्याल को विस्तार से बताया गया है। जिसमें राजा भैया माहिर थे। डॉ. गोहदकर वर्तमान में शारदानाथ संगीत महाविद्यालय थाटीपुर में नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं।

1959 में दी थी तानसेन समारोह में प्रस्तुति
डॉ. प्रभाकर उस दिन को याद करते हैं, जब उन्होंने 1959 में तानसेन समारोह में पहली बार प्रस्तुति देती थी। वे बताते हैं कि यह अनूठा अनुभव था। इसके बाद उन्होंने 1971 में दोबारा तानसेन समारोह में गाया।

इसके बाद भी वे कई समारोह में प्रस्तुतियां देते रहे। जिनमें 1960 में ग्वालियर में ध्रुपद समारोह में अपने ब्रदर इन लॉ के साथ दी प्रस्तुति उन्हें आज तक याद है। उन्होंने कहा कि ये जुगलबंदी जो 60 में शुरू हुई थी 1998 तक चली। उन्होंने बताया कि रीवा में ही उन्होंने ग्वालियर की संगीत परंपरा पर शोध कार्य किया था। उन्हें मुंबई की सुर शृंंगार परिषद से सुरमणि की उपाधि और शिर्डी में 2008 में श्रेष्ठ गायक का पुरस्कार हासिल हो चुका है।