
एक किस्सा लोकसभा का: जब एक साधारण उम्मीदवार से हार गए थे दो पूर्व मुख्यमंत्री
भोपाल. मध्यप्रदेश सरकार के दो पूर्व मुख्यमंत्री। नाम था अर्जुन सिंह और वीरेन्द्र कुमार सकलेचा। दोनों एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में थे। साल था 1996 का। तो दूसरी तरफ पिता-पुत्र इस सीट से चुनाव लड़े। पिता तो एक चुनाव जीता पर पर बेटे को जीत नहीं मिली। उस बेटे को जिसके पिता का दबदबा कांग्रेस में दिल्ली से लेकर भोपाल तक था। जो खुद मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री रह चुका था। जी हां ये सिसायत है विंध्य की। उसी विंध्य की जिसके व्हाइट टाइगर का किस्सा हम आपको बता चुके हैं। यहां मां का एक मंदिर है जो दुनिया भर में फेमस है। तो सियासत ऐसी है कि मुद्दे और चेहरे छोटे पड़ जाते हैं। यहां राजनीति सियासी वादों पर नहीं जातिगत आधार पर तय होती है। हम बात कर रहे हैं विंध्य क्षेत्र की दूसरी संसदीय सीट सतना की।
सतना लोकसभा सीट
एक किस्सा लोकसभा में आज हम बात करेंगे सतना लोकसभा सीट की। सतना लोकसभा सीट में कभी किसी एक दल का वर्चश्व नहीं रहा। 1998 से इस सीट पर भाजपा का कमल खिल रहा है तो कांग्रेस को आखिरी बार 1991 में इस सीट पर जीत मिली थी। सतना की सियासत में पार्टियां नेता बदलती रही हैं। सतना लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें चित्रकूट, नागौद, रामपुर बाघेलान, रैगांव, मैहर, सतना और अमरपाटन शामिल हैं। 2018 में मध्यप्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए थे। इन 7 विधानसभा सीटों में से 5 पर भाजपा का और 2 पर कांग्रेस की जीत हुई थी। इस सीट पर कांग्रेस को 1967 में पहली बार जीत मिली थी तो भाजपा को यहां से 1989 में पहली बार जीत मिली थी। सुखेन्द्र सिंह यहां से जीत दर्ज करने वाले भाजपा के पहले नेता थे।
बसपा उम्मीदवार से चुनाव हारे थे दो पूर्व मुख्यमंत्री
1996 के लोकसभा चुनाव के परिणाम ने प्रदेश की राजनीति में भूचाल लगा दिया था। वजह थी दो मुख्यमंत्रियों की हार। सतना लोकसभा में 1996 के चुनाव में अर्जुन सिंह चुनाव मैदान में थे। वहीं अर्जुन सिंह जो तीन बार मध्यप्रदेश के सीएम रह चुके थे और पंजाब के राज्यपाल। अर्जुन सिंह के मुकाबले में भाजपा के पास स्थानीय स्तर पर कोई कद्दावर नेता नहीं था। भाजपा ने एक पूर्व मुख्यमंत्री को हराने के लिए एक पूर्व सीएम पर दांव लगाया था। पूर्व मुख्यमंत्री का नाम था वीरेन्द्र कुमार सकलेचा। सकलेचा जनवरी 1978 से जनवरी 1980 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जनता को दो दिग्गजों में से किसी एक को चुनना था पर फैसला दोनों के ही खिलाफ था। जीतने वाले उम्मीदवार को सांसद बनने से ज्यादा खुशी थी दो दिग्गजों को हराने की। दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के मैदान में आने से सतना सीट देश के लिए हॉट सीट बन गई थी। इस सीट पर बसपा ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था। बसपा प्रत्याशी का नाम था सुखलाल कुशवाहा। जब परिणाम आए तो सियासत में भूचाल मच चुका था। दोनों पूर्व मुख्यमंत्री अपना चुनाव हार गए थे। जीत हुई थी बसपा उम्मीदवार सुखलाल कुशवाहा की। इस चुनाव में भाजपा के वीरेन्द्र सकलेचा दूसरे नंबर पर थे तो अर्जुन सिंह तीसरे नंबर पर थे।
जीत का आधार था जातिगत समीकरण
सुखलाल कुशवाहा की जीत इसी जातिगत समीकरण का आधार था और इसी जीते के साथ बसपा का विंध्य में प्रभाव बढ़ा था। अर्जुन सिंह, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा के मैदान में आने से ब्राम्हण और ठाकुर वोटों का ध्रुवीकरण हो गया था जबकि पटेल, काछी और दलित वोट बसपा के पक्ष में गए थे जिस कारण से यहां सुखलाल कुशवाहा की जीत हुई थी।
जातिगत समीकरण
2011 की जनगणना के मुताबिक सतना की जनसंख्या 22 लाख 28 हजार 935 है। यहां की 78.72 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्र और 21.28 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है। सतना में 17.88 फीसदी जनसंख्या अनुसूचित जाति और 14.36 फीसदी जनसंख्या अनुसूचित जनजाति की है। इसके अलावा सतना में बड़ी संख्या में ब्राम्हण, पटेल (कुर्मी वोटर), काछी वोटरों की बड़ी तादात में हैं। यहां हार जीत में पटेल और ब्राम्हण वोट अहम भूमिका निभाते हैं।
इस लोकसभा में जातिगत आकड़ा ऐसे समझिए
चित्रकूट विधानसभा में करीब 26 फीसदी ब्राह्मण वोटर हैं
रैगांव सीट पर वैश्य, ब्राह्मण व राजपूत 35 फीसदी
सतना में राजपूत-बनिया 12 फीसदी हैं
नागौद यहां ठाकुर 13 फीसदी है। वैश्य, व्यापारी-ब्राह्मण 20 व पिछड़े 31 फीसदी हैं।
मैहर यहां 14 फीसदी कुर्मी वोटर हैं
अमरपाटन में ब्राह्मण 15 व कोल 18 प्रतिशत हैं।
रामपुर बघेलान में ब्राह्मण 23 प्रतिशत हैं।
सतना सीट से कब कौन बना सांसद
1967में कांग्रेस के देवेन्द्र वी सिंह
1971 में भारतीय जनसंघ के नरेन्द्र सिंह
1977 में भारतीय लोकदल के सुखेन्द्र सिंह
1980 में इंदिरा कांग्रेस के गुलशेर अहमद
1984 में कांग्रेस के अज़ीज़ कुरैशी
1989 में भाजपा के सुखेन्द्र सिंह
1991 में कांग्रेस के अर्जुन सिंह
1996 में बसपा के सुखलाल कुशवाहा
1998 में भाजपा के रामानंद सिंह
1999 में भाजपा के रामानंद सिंह
2004 से 2019 तक भाजपा के गणेश सिंह
(लगातार तीन बार सांसद बने)
2014 का जनादेश
हमने पिता के जीत और बेटे के हार की बात की थी। ये हार थी अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह की। पिता इसी सीट से 1991 में अपना चुनाव जीत गए थे तो बेटा 2014 में इसी सीट से अपना चुनाव हार गये थे। 2014 के चुनाव में बीजेपी के गणेश सिंह ने अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह को हराया था। इस चुनाव में गणेश सिंह को 3 लाख 75 हजार 288 वोट मिले थे तो वहीं कांग्रेस के अजय सिंह को 3 लाख 66 हजार 600 वोट मिले थे। गणेश सिंह ने 8 हजार 688 वोटों से अजय सिंह को हराया था।
Published on:
05 May 2019 03:08 pm
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