
एक किस्सा लोकसभा का: यहां की जनता ने हर बार अपने लिए चुना बाहरी सांसद, एक साध्वी ने शुरू की थी सियासत
भोपाल. मध्यप्रदेश की सियासत में सिंधिया परिवार का दबदबा रहा है। एक साध्वी जो छोटी उम्र में संन्यास लेकर भागवत कथा का पाठ करती है। 25 साल की आयु में सियासत में कदम रखती है। मुख्यमंत्री भी बनती है तो सियासत की प्रखर वक्ता भी। यहां अपनों से ज्यादा बाहरी लोगों पर भरोसा है। महिलाओं का दबदबा रहा तो मां और बेटे का भी सिक्का चला। आप सोच रहे होंगे सिंधिया परिवार की सियासत से मैं मां बेटों की सियासत में कहां आ गया। इन सब बातों पर जरा गौर करिएगा। ये किस्सा एक ऐसी लोकसभा सीट का है जहां पार्टियों को स्थानीय उम्मीदवार नहीं मिलते हैं तो इस शहर का नाम दुनिया में फेमस है। हम बात कर रहे हैं खजुराहो लोकसभा सीट की।
एतिहासिक मंदिरों को कारण फेमस
वही खजुराहो जो अपनी मूर्तिकला और एतिहासिक मंदिरों के कारण दुनिया भर में जाना जाता है। इस लोकसभा से जुड़े रोचक किस्से जानने से पहले इस लोकसभा सीट की बात करते हैं। खजुराहो लोकसभा सीट पर पहला चुनाव साल 1957 में हुआ। खजुराहो सीट छतरपुर और कटनी जिले तक फैली हुई है। 1957 में इस सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी 1962 के बाद के बाद यहां चुनाव नहीं हुए थे। 1977 में परिसीमन के बाद यह सीट आस्तित्व में आई। इस सीट पर भाजपा का दबदबा रहा है। खजुराहो लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की 8 सीटें आती हैं। चांदला, राजनगर, पवई, गुन्नौर, पन्ना, विजयराघवगढ़, मुड़वारा और बहोरीबंद।
उमा ने यहीं से शुरू की सियासत
टीकमगढ़ जिले के डूंडा गांव में 3 मई, 1959 को गुलाब सिंह और बेटीबाई के घर में एक बेटी का जन्म हुआ था। परिवार वालों ने बेटी का नाम रखा था उमा। पांच साल की उम्र में हिन्दू धर्म ग्रंथ उसे याद हो गए थे गीता और रामायण कंठस्थ हो गए थे। गांव के लोग उस लड़की को दैवीय अवतार मानने लगे थे। बचपन में धाराप्रवाह प्रवचन देती थीं। प्रवचन की गूंज अब टीकमगढ़ से निकलकर ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया तक पहुंच गई थी। विजयाराजे सिंधिया ने एक बार उमा को प्रवचन करते हुए सुना। राजमाता विजयाराजे सिंधिया प्रभावित हुईं। उमा अब राजमाता विजयाराजे सिंधिया के सानिध्य में रहने लगीं। राजमाता के कहने पर भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गयीं। उमा ने राजमाता के कहने पर 1984 में खजुराहो लोकसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस के पक्ष में उमड़ी सहानभूति की लहर में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उमा भारती ने 1989 का लोकसभा चुनाव फिर से खजुराहो लोकसभा सीट से लड़ा। इस बार जीत मिली और पहली बार सांसद चुनी गयीं। उसके बाद लगातार 1991, 1996, 1998 के लोकसभा इसी सीट से चुनाव जीतती रहीं। राजमाता के कहने पर उमा ने चुनाव लड़ा इसलिए हमने शुरू में सिंधिया परिवार का जिक्र किया था। इस सीट की सियासत में भी सिंधिया परिवार के दखल था।
चार बार लगातार सांसद बनीं उमा
खजुराहो संसदीय क्षेत्र से चुने जाने वाले सांसदों में उमा भारती सबसे अधिक चार बार सांसद चुनी गईं। उमा भारती इस सीट से एक मात्र सांसद हैं जो केन्द्र में अभी तक मंत्री बनीं। उमा भारती 1998 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहीं। उमा भारती ने पहली बार 1989 में कांग्रेस की विद्यावती चतुर्वेदी को चुनाव हराया था। ये वही विद्यावती हैं जिन्हें इंदिरा गांधी का बेहद करीबी माना जाता था। विद्यावती चतुर्वेदी 1980 व 1984 में दो बार खजुराहो से सांसद रहीं। हमने शुरूआत में मां-बेटे के दबदबे की भी बात की थी। मां थीं विद्यावती और बेटे थे सत्यव्रत चतुर्वेदी। 1999 में सत्यव्रत चतुर्वेदी भी यहां से सांसद रहे। सत्यव्रत को भी सोनिया गांधी का करीबी माना जाता है।
खजुराहो लोकसभा सीट के नाम एक रिकॉर्ड भी दर्ज है। लोकसभा चुनावों के इतिहास में अब तक बुंदेलखण्ड से सबसे ज्यादा बार महिला प्रत्याशियों को संसद में भेजने वाली सीट खजुराहो ही है। अब तक यहां से छह बार महिला सांसद बन चुकी हैं। चार बार उमा भारती और दो बार विद्यावती चतुर्वेदी।
बाहरी नेताओं को चुनती है ये सीट
इस सीट का एक और रोचक किस्सा है। वो है बाहरी उम्मीदवार का। बुंदेलखंड की राजनीति का केंद्र रहे खजुराहो संसदीय क्षेत्र में अभी तक किसी भी दल ने स्थानीय उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा। हर बार यहां उम्मीदवार बाहरी होता है और जनता दो बाहरी नेताओं में से किसी एक को चुनती आई है। यहां के मतदाताओं के सामने 'स्थानीय' उम्मीदवार जैसा कोई मुद्दा नहीं है। वो हर बार किसी बाहरी प्रत्याशी को ही अपना सांसद चुन रहे हैं। बीजेपी को इस सीट पर अब तक 7 चुनावों में जीत मिली है। कांग्रेस को 6 बार जीत मिली है बीते 3 चुनावों से बीजेपी यहां से लगातार चुनाव जीत रही है। कांग्रेस को आखिरी बार इस सीट पर 1999 में जीत मिली थी।
कब कौन बना सांसद
1977 में भारतीय लोकदल के लक्ष्मी नारायण नाइक
1980 में कांग्रेस की विद्यावती चतुर्वेदी
1984 में कांग्रेस की विद्यावती चतुर्वेदी
1989 से 1998 तक भाजपा की उमा भारती
(लगातार चार बार यहां से चुनाव जींती)
1999 कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी
2004 भाजपा के डॉ रामकृष्ण कुसमारिया
2009 में भाजपा के जीतेन्द्र सिंह बुंदेला
2014 में भाजपा के नागेन्द्र सिंह
राजनीतिक समीकरण
2011 की जनगणना के मुताबिक खजुराहो की जनसंख्या 25 लाख 87 हजार 685 है। यहां की 81.78 फीसदी आबादी ग्रामीण और 18.22 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है। खजुराहो में 18.57 फीसदी अनुसूचित जाति और 15.13 फीसदी जनसंख्या अनुसूचित जनजाति की है।
2014 के परिणाम
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नागेंद्र सिंह ने कांग्रेस के राजा पटेरिया को हराया था। इस चुनाव में नागेंद्र सिंह को 54.31 फीसदी और राजा पटेरिया को 26.01 फीसदी वोट मिले थे। दोनों के बीच हार जीत का अंतर 2 लाख 47 हजार 490 वोटों का था।
सांसद का रिपोर्ट कार्ड
भाजपा के नागेंद्र 2014 का चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने। नागेंद्र सिंह की संसद में उपस्थिति 81 फीसदी रही उन्होंने संसद की 7 बहस में हिस्सा लिया पर कोई सवाल नहीं पूछा। नागेंद्र सिंह को उनके निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए 22.50 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे। उन्होंने 79.07 फीसदी खर्च किया। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में भाजपा ने उन्हें विधानसभा का टिकट दिया था। नागेन्द्र सिंह अब नागौद विधानसभा सीट से विधायक हैं। नागेन्द्र सिंह इससे पहले शिवराज कैबिनेट में मंत्री भी रह चुके थे।
Updated on:
25 Mar 2019 08:05 pm
Published on:
25 Mar 2019 03:14 pm
बड़ी खबरें
View Allभोपाल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
