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एक किस्सा: पिता एक बार तो बेटा 3 बार बना सीएम, जेल में जिस अफसर से हुई थी बहस उसी को दिया था प्रमोशन

एक किस्सा: पिता एक बार तो बेटा 3 बार बना सीएम, जेल में जिस अफसर से हुई थी बहस उसी को दिया था प्रमोशन

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भोपाल

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Pawan Tiwari

Apr 21, 2019

भोपाल. 1 नबंवर 1956 को देश में एक नए राज्य का गठन किया गया था। जिस व्यक्ति को इस नए प्रदेश का सीएम बनाया गया था। वो वकील भी था और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी। इस नेता ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटों को सौंपी थी। सियासत में कई परिवारों के किस्से आपने सुनें होंगे। क्योंकि सियासत है तो किस्से भी होंगे हम आपको आज एक ऐसे ही परिवार की सियासत का किस्सा बताएंगे जहां पिता एक बार मुख्यमंत्री बनता है तो बड़ा बेटा उसी प्रदेश का तीन बार मुख्यमंत्री बनता है। छोटा बेटा सबसे कम उम्र में सांसद बनता है और फिर इंदिरा और चंद्रशेखर की सरकार में मंत्री बनता है। क्या आपने कभी सोचा है 250 रुपए के कारण कोई नेता मुख्यमंत्री बन सकता है। इस लाइन को याद रखिएगा क्योंकि 250 रुपए का इस परिवार की सियासत में बड़ा ही अहम योगदान है।

शुक्ल परिवार का किस्सा
शुक्ल परिवार जो कभी सत्ता के शिखर में रहता था और आज इस परिवार का कोई जिक्र तक नहीं करता। 1 नबंवर, 1956 को देश में जिस नए राज्य का गठन हुआ था उसका नाम है मध्यप्रदेश। पहले मुख्यमंत्री बने थे पंडित रविशंकर शुक्ल। पंडित रविशंकर शुक्ल 1 नवम्बर 1956 से 31 दिसम्बर 1956 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे।

ईमानदार अफसर को दिया था प्रमोशन
आपने कभी सोचा है कि किसी सियासतदार से अगर कोई अधिकारी भिड़ जाए तो उसके साथ क्या हो सकता है और तब जब सियासतदार एक राज्य का मुख्यमंत्री हो। अगर आपने सिर्फ आज के दौर की सियासत देखी है तो आप यही कहेंगे। अफसर का तबादला हो जाएगा। लेकिन इसके उलट में आपको एक ऐसे अफसर का किस्सा बता रहा हूं जो एक नेता से भिड़ता है। फिर वो नेता मुख्यमंत्री बनता है और उस अफसर की प्रमोशन फाइल उसी मुख्यमंत्री की टेबल पर पहुंचती है। नेता थे पंडित रविशंकर शुक्ल। रविशंकर शुक्ल ने वकालत की थी। वकालत करते-करते वो कांग्रेसी हो गए थे। साल था 1937 का वकालत छोड़ नेतागिरी करने के चक्कर में रविशंकर शुक्ल को जेल जाना पड़ा था। जिस जेल में रख गया था वो जेल थी सिवनी की। शासन अंग्रेजों का था। जेल का एक नियम था हर शाम सभी कैदियों के अंगूठे का निशान लिया जाता था।


रविशंकर शुक्ल के अंगूठे का निशान लेने के लिए तब के डिप्टी कलेक्टर जेल पहुंचे। शुक्ल अंगूठे का निशान देने से इंकार करते हैं। कहते हैं मैं राजनीतिक बंदी हूं कैदी नहीं। डिप्टी कलेक्टर अंगूठे का निशान लेने के लिए अड़ जाता है। शुक्ल इंकार करते हैं। जेल में सिपाही बुलाए जाते हैं। डिप्टी कलेक्टर जबरन शुक्ल के अंगूठे का निशान लेते हैं। अब इस घटना के 13 साल बाद हम आपको लेकर चलते हैं। साल था 1950 का। देश आजाद हो चुका था। छोटी-छोटी रियासत को मिलाकर मध्यप्रांत बना था। मध्यप्रांत के मुख्यमंत्री बने थे पंडित रविशंकर शुक्ल। उनकी टेबल में अधिकारियों के प्रमोशन की फाइल आई थी। फाइल में जो पहला नाम था वो था सिवनी जेल में रविशंकर शुक्ल के अंगूठे का निशान लेने वाले डिप्टी कलेक्टर का। शुक्ल खोजबीन करते हैं। पता चला ये वहीं अधिकारी है सिवनी जेल वाला। शुक्ल ने कहा- अधिकारी ईमानदार है इसे प्रमोशन जरूर दो। खैर ये सियासत का एक और ही दौर था।

बेटा तीन बार बना सीएम
अब बात करते हैं शुक्ल परिवार के उस ताकतवर नेता की जो संजय गांधी के भी आदेशों को दरकिनार कर देता था और एक नहीं दो नहीं बल्कि तीन बार मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बना। रविशंकर शुक्ल के दो बेटे थे। श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल। श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री बने तो विद्या चरण शुक्ल संजय गांधी के खास दरबारियों में से एक हुआ करते थे। पिता रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद श्यामाचरण शुक्ल राजनीति में सक्रिय हुए। 1962 में पहली बार विधायक बने तो 67 में मिश्र दोबारा जीते तो उन्हें सिंचाई विभाग में मंत्री बनाया गया। राजा नरेशचंद्र सिंह को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बने अभी सिर्फ 13 दिन हुए थे कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। 1969 प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है। मुख्यमंत्री की रेस में डीपी मिश्रा का नाम सबसे आगे था। या फिर ये कहें का उनका सीएम बनना लगभग तय था। औपचारिकता के लिए विधायक दल की बैठक होनी थी। तभी मिश्रा के हाथ में एक टेलिग्राम थमाया गया। उस समय टेलीग्राम का दौर था टेलीफोन और सोशल मीडिया का नहीं। डीपी मिश्रा ने टेलीग्राम पढ़ा जिस हॉल में मिश्रा को टेलीग्राम दिया गया वहां सन्नाटा पसर चुका था। हाईकोर्ट ने मिश्रा को चुनाव प्रक्रिया में कदाचार का दोषी करार दिया था। वजह थी 1963 में हुए उपचुनाव में उन्होंने तय सीमा से लगभग 250 रुपए ज़्यादा खर्च कर दिए थे। हाईकोर्ट ने उनके छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। कांग्रेस मुश्किल में थी। कांग्रेस अब मुख्यमंत्री किसे बनाए। इस बार विचार चल रहा था। तब श्यामाचरण शुक्ल का नाम सामने आया। ।

विद्याचरण शुक्ल का दिल्ली में बढ़ा था कद
दूसरी तरफ श्यामाचरण शुक्ल के छोटे भाई विद्याचरण शुक्ल का दिल्ली में कद बढ़ रहा था। विद्याचरण शुक्ल अब संजय गांधी के दरबारियों में खास जगह बना चुके थे। विद्याचरण शुक्ल के संजय गांधी के करीबी होने का इनाम श्यामाचरण शुक्ल को मिला। 1971 के लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के कारण 1972 में श्यामाचरण की कुर्सी चली गई। मुख्यमंत्री बनाया गया इंदिरा गांधी के दरबार से भेजे प्रकाशचंद सेठी को। कहा गया कि संजय गांधी के फैसलों को दरकिनार करने के कारण कुर्सी गई। उधर संजय दरबार में विद्याचरण की हैसियत बढ़ी। जिसका इनाम फिर से श्यामा चरण श्यामाचरण शुक्ल को मिला। सेठी दिल्ली बुला लिए गए और दिसंबर 1975 में श्यामाचरण दूसरी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। इमरजेंसी के दौर में श्यामाचरण संजय की दरबार में हाजिरी नहीं लगाते थे। संजय गांधी जब अन्य कांग्रेस शासित राज्यों का दौरा करते थे तब वहां के सीएम एयरपोर्ट पर उनकी आगवानी के लिए खड़े रहते थे पर जब संजय भोपाल आते थे तो श्यामाचरण की जगह कोई मंत्री संजय गांधी का स्वागत करने पहुंचता था। जिससे संजय गांधी नाराज रहते थे।

तीसरी बार ऐसे बने सीएम
कांग्रेस दो खेमों में बंट चुकी थी एक था इंदिरा और दूसरा ब्रह्मानंद रेड्डी का। शुक्ला बंधु भी बंटे। श्यामाचरण शुक्ल रेड्डी खेमे की तरफ गए, तो विद्याचरण इंदिरा की तरफ। श्यामाचरण इंदिरा खेमे में वापस लौटना चाहते थे। लेकिन उनकी राह का रोड़ा बने अर्जुन सिंह। अब दोनों भाइयों का राजनीतिक कैरियर ढलान पर था। लेकिन ढलान भरे कैरियर में श्यामाचरण शुक्ल की किस्मत एक बार फिर से बुलंद होनी बाकी थी। अब कांग्रेस में राजीव का युग था। मध्यप्रदेश से अर्जुन सिंह राजीव के खास दरबारी बन चुकी थी। शुक्ल बंधु ढलान पर थे। राजीव ने अगस्त 1988 को श्यामाचरण को कांग्रेस में वापस बुलाया। नवंबर 1989 में लोकसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई। राजीव ने कई राज्यों के मुख्यमंत्री बदले। मध्यप्रदेश से मोतीलाल वोरा को हटाया गया और एक बार फिर ताज मिला श्यामाचरण शुक्ल को वो तीसरी बार मध्यप्रदेश के सीएम बने। पर कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव हुए। जिसमें कांग्रेस की हार हुई लेकिन 1993 के चुनाव में कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की। श्यामा ने फिर से सीएम की कुर्सी पर दावा ठोंका। मगर इस बार अर्जुन सिंह की सियासी चाल से वो उभर नहीं पाए। अर्जुन सिंह ने दिग्विजय का नाम आगे कर दिया।

2007 में निधन
इसके बाद दोनों शुक्ला बंधु राजनीति के मैदान से अस्त होते गए। 2007 में श्यामाचरण शुक्ल दुनिया को अलविदा कह गए तो विद्याचरण शुक्ल को भी खौफनाक मौत मिली। 2013 में छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में हुए नक्सल हमले में उनकी मौत हो गई। अब ये परिवार राजनीति का एक इतिहास बन चुका है।