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राजधानी में घरों, चौक-चौराहों से लेकर महाविद्यालयों के परिसर तक में चुनाव से पहले बहस का दौर शुरू

सरोजनी नायडू कन्या महाविद्यालय की छात्राओं ने कैंटीन में की चुनावी चर्चा...

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राजधानी में घरों, चौक-चौराहों से लेकर महाविद्यालयों के परिसर तक में चुनाव से पहले बहस का दौर शुरू

भोपाल। चुनावी चर्चा को लेकर इन दिनों घरों, चौक-चौराहों से लेकर महाविद्यालयों के परिसर तक गर्म है। शुक्रवार को ऐसा ही नजारा शासकीय सरोजनी नायडू कन्या महाविद्यालय की कैंटीन में देखने को मिला। छात्राओं की आंखों में इस बात की चमक थी कि वे पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगी।

बहस-मुबाहिसों का दौर चल रहा था। किसे और क्यों वोट दिया जाए, हमारे लिए उनके पास क्या है? हमने जाना आखिर युवा मन चाहता क्या है। बीएससी तृतीय वर्ष की छात्रा शिवानी कहती हैं कि चुनाव भी त्योहारों की तरह हो गए हैं। पांच साल बाद ही पार्टियों के नेता और प्रत्याशी मेहमान बनकर आते हैं। इसके बाद आम जनता की सुनने वाला कोई नहीं दिखता।

बीएससी की छात्रा सोनाली परमार का कहना है कि आज भी रोजगार के मामले में महिलाएं बहुत पीछे हैं। पढऩे-लिखने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिलती।

पहली बार वोट करने जा रही छात्रा रंजना पटेल ने महिला सुरक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने बेबाक होकर कहा कि उनका मत तो उसी को जाएगा जो प्रत्याशी महिला सुरक्षा को प्राथमिकता देगा। सड़क से लेकर घर तक सब जगह महिलाएं और युवतियां असुरक्षित होती जा रही हैं।

इसके लिए कड़े काननू बनने के साथ ही उनका पालन होना भी जरूरी है। बीए की छात्रा निवेदिता द्विवेदी ने आरक्षण को बड़ा मुद्दा बताया। निवेदिता ने कहा कि कम से कम शिक्षा और रोजगार के अवसरों में आरक्षण जैसी चीजें नहीं होनी चाहिए।

इधर, आधी आबादी पर पार्टियों को भरोसा नहीं...
भले ही रियासतकाल में भोपाल में नवाब बेगमों का शासन रहा हो, लेकिन मौजूदा दौर में महिला नेतृत्व हाशिए पर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने राजधानी में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया।

आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा ने 1998 के विधानसभा चुनाव में सुहास प्रधान को टिकट दिया था, उनके हारने के बाद पार्टी ने किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया।

उधर, कांग्रेस भी इस मामले में कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाई। साल 2008 के चुनाव में कांग्रेस ने विभा पटेल को गोविंदपुरा से टिकट दिया था, उनके हारने के बाद फिर किसी महिला प्रत्याशी पर भरोसा नहीं जताया।

दोनों ही दल महिलाओं को आगे बढ़ाने के दावे-वादे तो करते हैं, लेकिन राजधानी में 1998 से 2013 तक के विधानसभा चुनाव में ये झूठे साबित हुए। 2008 के बाद भोपाल में विधानसभा सीटें बढ़कर 7 हो गईं, लेकिन इनमें से किसी भी सीट पर महिलाओं को मौका नहीं मिला।

निकायों में आरक्षण के चलते मौका मिल जाता है, लेकिन विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं होता। भाजपा में इसकी कमी महसूस होती है। इस बार पार्टी महिलाओं को उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रही है।
- कृष्णा गौर, भाजपा

मैं महापौर के रूप में परफॉर्म कर सकती हूं तो विधानसभा कौन सी बड़ी बात है। महिलाओं को टिकट देने से संतुलन बना रहता है। पार्टी को कम से कम एक महिला को तो टिकट देना चाहिए।
- विभा पटेल, कांग्रेस