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2018 में बना था फीस रेगुलेशन एक्ट, दो साल में नहीं बन सके नियम

- निजी स्कूलों की मनमानी रोकने में पोपले मुंह सा अक्षम साबित हो रहा बिना नियमों का दंत विहीन कानून - 1973 में भी हुआ था फीस नियंत्रण एक्ट पर काम पर लेकिन नोटिफाई नहीं हुआ था, अब नोटिफाई हुआ तो नियम नहीं बने - 47 साल में प्रदेश में नहीं लग सकी निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक  

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2018 में बना था फीस रेगुलेशन एक्ट, दो साल में नहीं बन सके नियम

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भोपाल. निजी स्कूलों की मनमानी रोकने और फीस की मनमानी बढ़ोत्तरी पर लगाम लगाने के लिए प्रदेश में जनवरी 2018 में फीस रेगुलेशन एक्ट बनाया गया। फरवरी 2018 में यह प्रकाशित भी हो गया। इसके बाद से दो साल बीत चुके हैं, लेकिन इस एक्ट के कानून ही नहीं बन सके। यही कारण है कि न तो निजी स्कू लों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी पर लगाम लगाई जा पा रही है, न ही बिना उपयोग के वसूली जा रही ट्रांसपोर्ट, मैस और अन्य मदों की पूरी फीस की लूट पर ही रोक लग पा रही है। निजी स्कू ल गैर लाभकारी संगठन हैं जो समितियों के माध्यम से चलते हैं। लेकिन वास्तव में यह मोटे मुनाफे वाला व्यापार कर रहे हैं। इनकी गतिविधि नियंत्रित करने के लिए प्रदेश में 1973 में भी शुल्क विनियामक कानून की रुपरेखा बनी थी लेकिन तब वह नोटिफाई नहीं हो पाया, इसके बाद दशकों तक मामला दबता रहा और निजी स्कू लों की लूट-खसोट बढ़ती गई। प्रदेश भर के अभिभावक लम्बे समय से स्कू लों की फीस पर नियंत्रण की मांग कर रहे थे। इस बीच ग्वालियर हाईकोर्ट ने 2016 एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि प्रदेश में स्कू लों के रगुलेशन के लिए नियम तो होना चाहिए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने फीस नियंत्रण के लिए कानून की जरुरत जताई थी।कोर्ट ने माना था कि स्कू ल गैर लाभकारी संगठन है, यहां मनमानी फीस नहीं वसूली जा सकती। इसके बाद कई राज्य सरकारों ने एक्ट बनाना शुरू किया। दिल्ली सहित कई राज्यों में ऐसे कानून बनते गए। 2016 में नागरिक उपभोक्ता मंच ने जबलपुर हाईकोर्ट में भी इस सम्बंध में याचिका लगाई तब भी कोर्ट ने निर्देश दिए। आखिरकार अभिभावकों के दबाव और कई आदेशों के निर्देश के बाद मप्र सरकार ने फीस विनियामक कानून 2018 बनाया। जनवरी 2018 में आए कानून को फरवरी 2018 में प्रकाशित भी कर दिया गया। नोटिफिकेशन के बाद धारा 14 के अंतर्गत इसके अंतर्गत नियम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। सरकार ने आम जनता से सुझाव मांगे, पालक महासंघ से लेकर अभिभावकों और जागरुक नागरिक सुझाव देते रहे लेकिन सरकार ने नियम तय नहीं किए। कुछ महीनों बाद चुनाव नजदीक आ गए और नियम बनाने का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। आज इस कानून को बने दो साल दो महीने से ऊपर हो चुके हैं। लेकिन इसके नियमों का अता-पता नहीं है, और इसी की आड़ में स्कू ल मनमानी किए जा रहे हैं। फीस रेगुलेशन एक्ट में हो महामारी के विशेष प्रावधान कई अदालती आदेश और पालकों की मांग के बाद सरकार ने एक्ट तो बनाया लेकिन इसके बाद इसके कानून नहीं बनाकर इसे ताकत ही नहीं दी। जिले में फीस नियामक कमेटी का अध्यक्ष कलेक्टर होता है, चार सदस्य उसकी सहायता के लिए होते हैं, लेकिन आज तक एक भी बैठक नहीं हुई, कह दिया जाता है, नियम ही नहीं है। कानून तो है, लेकिन उसकी जान सरकार ने कैद कर रखी है। वर्तमान में जनता के सामने कोरोना संक्रमण जैसा अभूतपूर्व संकट आया है और इस दौरान जिस तरह स्कू ल बिना, बिना ट्रांसपोर्ट, मैस के पूरी फीस वसूलने पर उतारू हैं, उसे देखते हुए नियमों में महामारी से जुड़े विशेष प्रावधान भी शामिल किए जाने चाहिए। प्रबोध पंड्या, महामंत्री, पालक महासंघ