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500 साल पुरानी तुर्रा कलगी शैली में गायन व नृत्य से सुनाई जाती है कहानी

जनजातीय संग्रहालय में राजकुमारी फुलवंती का मंचन

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500 साल पुरानी तुर्रा कलगी शैली में गायन व नृत्य से सुनाई जाती है कहानी

500 साल पुरानी तुर्रा कलगी शैली में गायन व नृत्य से सुनाई जाती है कहानी

भोपाल. मप्र जनजातीय संग्रहालय में रंग प्रयोगों के प्रदर्शन की साप्ताहिक शृंखला अभिनयन में शुक्रवार को अकबर काकजी (राजस्थान) के निर्देशन में तुर्रा कलगी शैली में राजकुमारी फुलवंती का मंचन सभागार में हुआ। इसकी समय सीमा 1 घंटा 30 मिनट रही। कलाकारों ने राजकुमारी फुलवंती की कथा को गायन, नृत्य और अभिनय के सहारे तुर्रा कलगी शैली में प्रस्तुत किया। इस शैली में मंचन राजस्थान और मप्र की पश्चिम सीमा पर रहने वाले कलाकार करते हैं। ये शैली ५०० साल पुरानी है। इसमें महिलाओं की श्रेष्ठता को दिखाया जाता है। कलाकार नारायण लाल जोशी ने बताया कि पहले गांवों में उत्सव या जागरण के समय मनोरंजन के लिए जो कहानियां प्रस्तुत की जाती थीं, उसमें गायन के साथ नृत्य होता था। तुर्रा कलगी शैली लोक पंरपरा से जुड़ी है। ये संस्कृति और उत्सव में मिलने वाली खुशी का प्रतीक माना जाता है।

भाभी से नाराज होकर चला जाता है राजकुमार
कहानी राजगढ़ की राजकुमारी फुलवंती व सूरजगढ़ के राजकुमार फूल सिंह हैं। एक दिन फूल सिंह भाभी से नाराज होकर घर से चला जाता है। वह राजगढ़ की सीमा में प्रवेश कर जाता है और एक मालिन के यहां आश्रय लेता है। उसे पता चलता है कि मालिन फुलवंती के लिए माला बनाती है। एक दिन फूल सिंह मालिन से जिद कर राजकुमारी के लिए खुद माला बनाता है। राजकुमारी को माला बहुत पसंद आती है। वह मालिन से माला बनाने वाले के संदर्भ में पूछती है। राजकुमार फूल सिंह स्त्री का वेश बनाकर राजकुमारी से मिलने जाते हैं। जहां राजकुमारी उन्हें पहचान लेती है कि यह कोई पुरुष है। अंतत: भेद खुल जाता है और पता चलता है कि यह व्यक्ति कोई और नहीं सूरजगढ़ का राजकुमार है। अंत में दोनों का विवाह हो जाता है।