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मणिपुर की ये लोक कथा देती है सच का साथ देने की सीख

अभिनयन शृंखला में मणिपुरी स्वांग शैली में लोक नाट्य 'खोइरेंताक' का मंचन

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मणिपुर की ये लोक कथा देती है सच का साथ देने की सीख

मणिपुर की ये लोक कथा देती है सच का साथ देने की सीख

भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में अभिनयन शृंखला में शुक्रवार को मणिपुरी स्वांग शैली में लोक नाट्य 'खोइरेंताक' का मंचन संग्रहालय सभागार में हुआ। युवा रंगकर्मी के नीलध्वज खुमन ने इसका लेखन व निर्देशन किया है। इसका संगीत निर्देशन मोइरन्थेम रोबर्ट मीतेई ने किया। स्वांग शैली मे मणिपुर के 16 कलाकारों ने अत्यंत भावपूर्ण अभिनय कर दर्शकों को स्थान से बांधे रखा। नाटक के माध्यम से ये संदेश दिया गया कि झूठ कितना भी जोर से बोला जाए अंत मैं पराजित ही होता है। इस प्रस्तुति की अवधि एक घंटे दस मिनट रही। डायरेक्टर ने बताया कि यह लोक कथा मणिपुर में काफी प्रसिद्ध है ।

युवराज चीड्खुबा और पदाधिकारी नोद्बान कोयाम्बा अधिपुरुष और सेवक के घनिष्ट मित्र हैं। चीड्खुबा की एकमात्र पुत्री थोइबी से नोद्बान सगाई करना चाहते हैं किन्तु अत्यधिक क्रोधी स्वाभाव की पुत्री थोइबी को कुछ समय के लिए मायन्नमार निर्वासित कर देते हैं। कुछ समय व्यतित हो जाने के बाद चीड्खुबा पुत्री थोइबी को वापस बुलाते हैं। राह में प्रतिक्षारत नोद्बान को चकमा देकर थोइबी अपने प्रेमी खाम्बा के साथ चली जाती है। नोद्बान राज परिवार पर झूठा आरोप लगाता हैं। घनिष्ट मित्रता के चलते पदाधिकारी सही निर्णय नहीं ले पाते तो फैसला ईश्वर पर छोड़ देते हैं।

नोद्बन बन जाता है बाघ का शिकार

इधर, राज्य में सदियों पुरानी ईश्वरी आज्ञा की परंपरा चली आ रही होती है। खोइरेंताक नामक स्थान पर बाघ का आतंक पूरे क्षेत्र में पसरा हुआ है। एक दिन सब्जी एकत्र करने गई एक युवती को बाघ ले जाता है। नगरवासी बाघ को पकडऩे के लिए ईश्वरी आज्ञा मानकर खामबा और नोद्बान को आदेशित करते हैं। आज्ञा का पालन करने दोनों खोइरेंताक की ओर निकल पड़ते हैं। दुष्ट नोद्बन बाघ का शिकार बन जाता है और खामबा वापस लौट कर अपनी पत्नी खोइबी को ससम्मान अपने गृह नगर ले जाता है।