
भोपाल। प्रदेश की आंचलिक बोलियों में लोकनाट्यों पर केंद्रित तीन दिवसीय पहचान समारोह का आयोजन किया जा रहा है। समारोह के अंतिम दिन स्वांग शैली में 'सूरा' की प्रस्तुति हुई। प्रस्तुति का निर्देशन टीकमगढ़ के संदीप श्रीवास्तव ने किया। स्वांग बुंदेलखंड का पारंपरिक लोकनाट्य है। इसे प्राय: नृत्य राई में विश्राम के क्षणों पर किया जाता है। स्वांग में किसी प्रसिद्ध रूप की नकल रहती है। इस प्रकार से स्वांग का अर्थ किसी विशेष, ऐतिहासिक या पौराणिक चरित्र, लोकसमाज में प्रसिद्ध चरित्र के अनुरूप अभिनय करना है।
स्वांग की शुरुआत देवी-देवता की आराधना से होती है। भगवान विष्णु, गणेश और माता शारदा की स्तुति की जाती है। सूरा स्वांग में दिखाया गया कि एक सेठ अपनी सेठानी को लेकर दूसरे गांव किराना बेचने जाता है, जहां उसे गांव का एक चौकीदार दुकान रखने नहीं देता लेकिन सेठ चौकीदार को महीने में कुछ पैसा और अन्य सामान देकर दुकान रखने के लिए मना लेता है। सेठ चौकीदार से किराए का मकान और रखवाली के लिए दूसरे चौकीदार की मांग करता है। चौकीदार एक सूरा नाम के आदमी को सेठ से मिलाता है। सूरा देख-सुन सकता है, वह अमीर होता है और धन की रक्षा करने के लिए वह अंधे होने का ढोंग रचता है।
चौकीदार से शादी कर लेती है सेठानी
सेठ और सूरा के बीच बातचीत होती है। सेठ सूरा को हर महीने 10 रुपए वेतन देने की बात करता है लेकिन सूरा कहता है नहीं, उसे सिर्फ 5 रुपए ही चाहिए। थोड़ी देर के बाद सोचता है कि सेठ इतनी आसानी से मान गए तो फिर सूरा कहता है कि उसे हर माह 2 रुपए और हर दिन सूखी रोटी, नमक और प्याज ही चाहिए। सेठ दूसरे गांव किराना बेचने निकल जाता है। तभी उसे अन्य सामान की याद आती है, वह वापस घर पहुंच कर देखता है कि सूरा घर की अच्छे से चौकीदारी कर रहा है। सेठ के घर से जाने के कुछ दिन बाद सूरा सेठानी को अपनी बातों में फंसा कर उससे शादी कर लेता है। अंत में सेठ के मनाने भी पर सेठानी तैयार नहीं होती है और सूरा के आवाज लगाने पर वह तैयार हो जाती है जो हमेशा के लिए सूरा की पत्नी हो जाती है।
Published on:
12 Sept 2021 08:04 pm

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