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छह अस्पताल: डॉक्टर, सुविधाएं और मर्ज का पूरा इलाज कहीं नहीं

सांस और फेफड़ों की समस्या से पीडि़त 100 से ज्यादा मरीजों को रोजाना बिना इलाज के गैस राहत अस्पतालों से लौटना पड़ रहा है

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gas relif hospital

भोपाल। काजी कैम्प निवासी ६५ वर्षीय रईस खान को फेफड़ों में संक्रमण है। खांसी बनी रहती है। डीआईजी बंगला अस्पताल में दिखाने के बाद उन्हें रसूल अहमद सिद्दीकी पल्मोनरी मेडिसिन सेंटर भेजा गया, जहां डॉक्टर्स ने जांच के बाद भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) रैफर कर दिया। यहां पता चला कि ना तो कल्चर टेस्ट हो रहा है, ना ही एमआरआई।

जिंदगी से जुड़ चुके मर्ज का इलाज कराने भटक रहे रईस खान का मामला विरला नहीं है। सांस और फेफड़ों की समस्या से पीडि़त 100 से ज्यादा मरीजों को रोजाना बिना इलाज के गैस राहत अस्पतालों से लौटना पड़ रहा है। उनके इलाज के लिए बने अस्पताल गैस त्रासदी के ३३ साल बाद भी इलाज नहीं दे पाए। अंतत: स्मारक से खड़े हैं।

रईस का कहना है कि पांच साल पहले उनकी किडनी खराब हो गई थी, तब से वे कमला नेहरू अस्पताल में डायलिसिस करवाते हैं। यहां भी कई बार डायलिसिस नहीं मिलती। छह महीने से सांस भी उखडऩे लगी। जांच कराई तो बताया कि फेफड़ों में संक्रमण है। अब बीएमएचआरसी जैसे बड़े अस्पताल में हमारे लिए इलाज नहीं है। कुछ समझ नहीं आता कि कहां जाएं। इधर, इतने सब कुछ के बावजूद भोपाल गैस त्रासदी, राहत एवं पुनर्वास मंत्री विश्वास सारंग कहते हैं कि पीडि़तों को समुचित सुविधाएं दी जाएंगी। उनके इलाज और पुनर्वास के लिए उच्चस्तरीय समिति काम कर रही है। हालांकि, यह बात अलग है कि समिति की रिपोर्ट का अता-पता नहीं है। मंत्री बताते हैं कि 4,315 गैस पीडि़त कैंसर रोगियों के इलाज पर सरकार ने 39 करोड़ 28 लाख रुपए खर्च किए हैं।

- विशेषज्ञ नहीं टेक्नीशियसं करते हैं डायलिसिस

करीब 12 साल से किडनी की परेशानी से जूझ रहे ४१ वर्षीय अकील अहमद बताते हैं कि बीएमएचआरसी और कमला नेहरू अस्तपाल सहित किसी गैस राहत अस्पताल में किडनी राग विशेषज्ञ नहीं है। यहां डायलिसिस जैसा संवेदनशील काम भी टेक्नीशियन या वार्ड बॉय करते हैं। वे बताते हैं कि जो लोग सक्षम हैं वो तो निजी अस्पतालों में चले जाते हैं, लेकिन अन्य मजबूरी में यहां आते हैं।

- रोज पहुंचते हैं सात हजार पीडि़त

भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के अब्दुल जब्बार ने बताया कि गैस पीडि़तों के लिए बने छह बड़े अस्पतालों में रोजाना सात हजार गैस पीडि़त इलाज के लिए आते हैं। इनमें से 1500 मरीजों निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। इसी तरह गैस पीडि़त संगठन की रचना ढींगरा बताती हैं कि सैकड़ों गैस पीडि़तों को सही उपचार नहीं मिला।

- आंख के डॉक्टर और इलाज दिल का

कमला नेहरू अस्पताल सुपरस्पेशिएलिटी अस्पताल में भी चंद डॉक्टर हैं। इसमें से भी सबसे ज्यादा नेत्ररोग विशेषज्ञ। अस्पताल के आईसीयू की जिम्मेदारी नेत्ररोग विशेषज्ञों पर ही है। कई एेसे मौके ऐसे आए जब आईसीयू हार्ट अटैक के मरीज पहुंचे तो इन चिकित्सकों ने फोन पर हार्ट स्पेशलिस्ट से जानकारी लेकर इलाज किया।

- नहीं है इलाज का प्रोटोकॉल

आईसीएमआर गैस पीडि़तों के लिए ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल तैयार करने की बात करता रहा है, लेकिन अब तक कोई प्रोटोकॉल नहीं बना। गैस पीडि़तों को बिना गहन जांच दवाएं दी जा रही हैं। रिटायर्ड माइक्रोबायलोजिस्ट डॉ. दीपक दुबे भी बताते हैं कि सटीक उपचार कम से कम कल्चर जांच तो कराई जारी चाहिए। इससे यह स्थिति साफ होती है कि मरीज में कौन सा बैक्टीरिया या वायरस मौजूद है और इस पर कौन सी दवाई असर करेगी, लेकिन किसी भी अस्पताल में इस जांच की व्यवस्था नहीं है।

कहां क्या दिक्कतें

अस्पताल - रोजाना मरीज - दिक्कतें
बीएमएचआरसी - 800 से 1000 - डॉक्टरों की कमी, विभाग बंद, जांच करने वाले नहीं

कमला नेहरू अस्पताल - 800 से 1000 - डॉक्टरों की कमी, विभाग बंद, जांच करने वाले नहीं
मास्टर लाल सिंह अस्पताल - 600 से 800 - डॉक्टरों की कमी, दवाओं की कमी

रसूल अहमद सिद्दिकी पल्मोनरी सेंटर - 500 से 600 - डॉक्टरों की कमी, दवाओं की कमी, कई जांचे बंद
जवाहर लाल नेहरू अस्पताल - 800 से 1000 - डॉक्टरों की कमी, दवाओं की कमी, जांच करने वाले नहीं

शाकिर अली अस्पताल - 600 से 800 - डॉक्टरों की कमी, गंदगी, पीने का पानी तक नहीं, दवाओं की कमी