
धागा जलाने पर काला धुंआ निकले तो पश्मीना की नकल
भोपाल। भोपाल हाट में चल रहे खादी मेला में विभिन्न राज्यों के बुनकर हाथों से बने विभिन्न उत्पाद लेकर आए हैं। यहां श्रीनगर के शौकत बट विंटर सीजन के लिए स्पेशल कलेक्शन के लिए आए हैं।
इसमें सबसे स्पेशल है पश्मीना शॉल का कलेक्शन। शौकत का कहना है कि यूथ और एलिट क्लास अपना स्टेट मेंटेंन करने लिए पश्मीना शॉल का काफी पसंद करते हैं। अक्सर इसकी पहचान न होने ठगी का भी डर रहता है।
पश्मीना शॉल के धागे की सबसे बड़ी खासियत होती है कि इसे जलाने पर काला धुंआ नहीं निकलता है। जबकि सिंथेटिक या अन्य वुलन को जलाने पर काला धुंआ देखने में आता है। इसी तरह इसकी स्मेल भी बहुत अलग होती है। एक धागे को जलाकर असली पश्मीना की पहचान की जा सकती है।
एक भेड़ से मिलता पचास से सौ ग्राम ऊन
शौकत का कहना है कि पश्मिना शॉल के लिए स्पेशल लेम का ही वुलन यूज किया जाता है। लेह में माइनस 14 डिग्री टेम्प्रेचर के बीच रहने वाले इसे भेड़ का वुलन ठंड में निकाला जाता है। गर्मी में यदि ऐसा किया जाए तो भेड़ की मौत भी हो सकती है।
एक भेड़ से महज पचास से सौ ग्राम वुलन निकलता है। एक शॉल को तैयार करने में पंद्रह दिन से एक माह का समय लग जाता है। ये शाल वजन में भी काफी हल्की होती हैं। इसे कैरी करना काफी आसान होता है। सेमी पश्मीना शॉल में छोटी के साथ बड़ी भेड़ का ऊन भी मिक्स किया जाता है। जो पश्मीना शॉल की तरह शुद्ध नहीं होती।
जैविक कपड़ा से तैयार किया फेब्रिक
राजस्थान के दौसा से आए पवन कुमार भारद्वाज का कहना है कि जैविक फेब्रिक से तैयार कपड़ा भी लेकर आए हैं। इस कपड़े की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे पहनने से किसी तरह का इंफेक्शन नहीं होता। बिजनेसमैन और पॉलिटिकल पर्सन इसे ज्यादा पसंद करते हैं। इसे पूरी तक से ऑर्गेनिक कपास से तैयार किया जाता है।
Published on:
20 Oct 2018 08:16 am
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