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आदिवासियों को मजबूर किया गया तो कानूनी रास्ता अपनाएगा संगठन

अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ ने खोला मोर्चा

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आदिवासियों को मजबूर किया गया तो कानूनी रास्ता अपनाएगा संगठन

आदिवासियों को मजबूर किया गया तो कानूनी रास्ता अपनाएगा संगठन

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयं संघ (आरएसएस) द्वारा जनगणना में आदिवासियों से धर्म वाले कॉलम में हिन्दू लिखवाने की तैयारी के बीच आदिवासी नेता भी सक्रिय हुए हैं। उनका कहना है कि आरएसएस ने यदि आदिवासियों को मजबूर किया तो वे कानूनी रास्ता आख्तियार करेंगे। कांग्रेस नेता एवं अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अजय शाह ने रविवार को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहा कि आरएसएस को अपने मंसूबे पर कामयाब होने नहीं देंगे।

उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश ऐसा राज्य है जहां सर्वाधिक आदिवासी निवास करते हैं। प्रदेश के मूल निवासी होने के नाते वे आरएसएस को इस बात की कतई अनुमति नहीं देंगे कि वे भोले-भाले आदिवासियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक सम्बद्धता दिलाने को मजबूर किया जाए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि आदिवासी हिन्दू नहीं है। हम लोग प्राकृतिक पूजा करते है, मूर्ति पूजक नहीं करते है। आरएसएस मनुस्मृति में विश्वास करते है। आरक्षण के सवाल पर उन्होंने कहा कि हमें आरक्षण हिन्दू होने से नहीं बल्कि हमारी सामाजिक आर्थिक स्थिति के कारण मिला है। उन्होंने जनगणना में अलग से धर्म कोट दिए जाने की मांग भी की।

संघ की बैठक के बाद से बवाल —
2021में होने जा रही जनगणना अब संघ का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा है। संघ की हाल ही में भोपाल में हुई बैठक में नागरिकता संशोधन कानून के साथ ही 2021 की जनगणना को अपने एजेंडे में रखा थ। यहां बताया गया था कि ऐसी जानकारी मिल रही है कि आदिवासियों के बीच कुछ ऐसे संगठन काम कर रहे हैं जो जनगणना के समय आदिवासियों से हिंदू की जगह अन्य जाति या धर्म लिखवाना चाहते हैं। 1991 की जनगणना में हिंदुओं की संख्या 84 प्रतिशत थी जो 2011 में घटकर 69 प्रतिशत हो गई। आदिवासियों खासतौर पर भील,गौंड समुदाय के अपने नाम के साथ हिंदू की जगह अन्य जाति या धर्म लिखवाने के कारण जनसंख्या में हिंदुओं के प्रतिशत में कमी आयी है। यही वजह है कि अब संघ अपना फोकस जनगणना और आदिवासियों पर रखेगा। संघ का फोकस अब सामाजिक कल्याण के साथ ही दलितों को सर्वण वर्ग से जोड़ने के अभियान पर है। यानि दलितों को मंदिर-कुंओं और श्मशान के अभियान से जोडा जाएगा।