
ओडिशा के इस गांव में थी रावण के सोने की लंका, मूर्ति की पूंछ में आग लगाकर निकाली जाती है यात्रा
भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में 'हनुमान उत्पति' कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। ओडिशा में कुम्हारी परम्परा में ऐसा माना जाता है कि रावण की लंका यही थी। संग्रहालय एसोसिएट पी अनुराधा के अनुसार ओडिशा के सोनपुर में जन्म से मृत्यु तक के अनुष्ठानों में उपयोग किए जाने वाले पारम्परिक मृदभांडों तथा मिट्टी के बर्तनाों का उपयोग किया जाता है।
कृषि और पशुपालक समुदाय जीवन व्यापन तथा व्यवस्थापन के लिए मुख्य रूप से अपने आसपास के वातावरण पर निर्भर रहते है। इस प्रक्रिया में जानवरों के साथ उनका आत्मिक संबंध हो जाता है, जिसके कारण इनके जीवन शैली में जानवरों की पूजा करने की परम्परा का विकास हुआ है। मिट्टी से बनी पशु मूर्ति की पूजा करना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस प्रदर्शनी में मुख्य रूप से कुम्हार उत्पति की कहानी, लंकापति हनुमान, जागर दीपा, ठकुरानी मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है।
सोनपुर में मिट्टी के बर्तन और टेराकोटा कला की परंपरा आज भी जारी है
सोनपुर में मिट्टी के बर्तन और टेराकोटा कला की परंपरा आज भी जारी है। क्षेत्रीय लोगों के द्वारा टेराकोटा की बैल आकृतियां पुरोनस या पुरा बलादा गौधन को समर्पित अनुष्ठान ग्रामीण जीवन का एक अटूट अंग है। इस अनुष्ठान का आयोजन सितंबर में भद्ररभा अमावस्या पर बैल के प्रतीकों की पूजा कर किया जाता है। हनुमान जी की टेराकोटा प्रतिकृति लंकापति जात्रा से जुड़ी है। जो रामायण के लंका दहन कांड की स्मृति कराता है। युवा टेरकोटा निर्मित हनुमान जी की मूर्ति आकृति की पूंछ में तेल से भीगा कपड़ा लपेटकर आधी रात तक अभिनय कर दौडते हैं। बाद में पूंछ को दौड के दौरान जलाया जाता है। छत की खपरेलों को पशुओं की आकृतियों से सजाया जाता है। ये आकृतियां बुरी आत्माओं से रक्षा करती है।
Published on:
03 Apr 2019 08:46 am
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