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उपचुनाव का रण : कहीं जनता तय करती है सरकार, तो कहीं विधायक नहीं होते रिपीट

आज हम आपको इन विधानसभा सीटों के कुछ बेहद रोचक किस्से सुनाते हैं, जिनके बारे में आपने पहले शायद ही सुना होगा।

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उपचुनाव का रण : कहीं जनता तय करती है सरकार, तो कहीं विधायक नहीं होते रिपीट

भोपाल/ मध्‍य प्रदेश में होने जा रहे 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव देश के किसी किसी छोटे राज्य के विधानसभा चुनाव के बराबर ही हैं। हालांकि, देश के इतिहास में ऐसा पहली बार ही हो रहा है कि, इतनी बड़ी तादात में विधानसभा सीटों का उपचुनाव होने जा रहे हैं। 22 विधायकों के साथ पाला बदल कर भाजपा में जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के कारण मध्‍य प्रदेश की कांग्रेस की सरकार गिर गई थी। दोनो ही प्रमुख दलों के लिए ये उपचुनाव साख की लड़ाई बना हुआ है, जिसके कारण भाजपा हो या कांग्रेस दोनो ही जीत के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।

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दोनो दलों को ये साबित करना होगा

चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के लिए जहां एक तरफ चुनौतियों का अंबार खड़ा हुआ है। वहीं, दोनो ही दलों को इस चुनाव का कारण बने ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के निर्णय को अपने अपने स्तर पर सही ठहराना है। जैसे, कमलनाथ को ये साबित करना है कि उनके 15 महीने का कार्यकाल प्रदेश के लिए फायदेमंद था और उनके साथ धोखा हुआ। वहीं, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूरी भाजपा को ये साबित करना है कि, कमलनाथ सरकार उन्हीं के रवैय्ये के कारण गिरी थी, न कि भाजपा का उसमें कोई दखल था।

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जीत में जुड़ी है इन नेताओं की साख

भाजपा ने 28 विधानसभा सीटों के अपने सभी उम्मीदवार घोषित कर दिए और कांग्रेस ने भी ब्यावरा छोड़कर सभी 27 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। ये चुनाव कई मायनों में दिलचस्प होने जा रहा है। अव्वल तो कोई एक ऐसा मुद्दा नहीं होगा जो सर्वव्यापी हो, लिहाजा सभी जगह स्थानीय मुद्दे ज्यादा असरकारक होंगे। जनता के नजरिये से देखें तो, उप-चुनाव पार्टीपरक होने के बजाय व्यक्तिपरक होंगे। दांव पर तीन नेताओं की क्षमताएं सबसे अधिक होंगी, इनमें कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंघिया और शिवराज सिंह चौहान शामिल हैं। हालांकि, राजनैतिक जानकार हमें कई महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, लेकिन आज हम आपको इन विधानसभा सीटों के कुछ बेहद रोचक किस्से सुनाते हैं, आइये जानें।

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ये दिलचस्प बातें कम हो लोगों को होंगी मालूम

मान्यता है कि, मध्य प्रदेश के उज्जैन में होने वाला कुम्भ मेला जिसे सिंहस्थ कहा जाता है, वो जिस भी मुख्यमंत्री के कार्यकाल में होता है वो अगला सीएम नहीं होता। शिवराज के कार्यकाल में भी 2016 में सिंहस्थ हुआ, मान्यता के अनुसार वो विधानसभा चुनाव हार भी गए। हालांकि, बाद में वो एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए, इस दौरान उन्होंने 15 महीने सत्ता का वनवास काटा।

-एमपी में भाजपा सरकार सिर्फ 4337 वोटों के कारण चली गई थी। सूबे की 10 विधानसभा सीटें तो ऐसी भी थीं, जहां जीत और हार का अंतर महज एक हज़ार या उससे भी कम वोट का था।

-विधानसभा चुनाव की ही तरह क्या इस बार भी नोटा कांग्रेस के लिए मददगार होगा। ये सवाल भी बड़ा है क्‍योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने नेपानगर, ब्यावरा और सुहासरा सीट नोटा के कारण ही जीती थीं।

- ये बात तो सभी जानते हैं कि, मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हर पांच साल में होते हैं, लेकिन सूबे की मुंगावली विधानसभा एक ऐसी सीट है, जहां बीते तीन सालों से हर साल लगाता चुनाव हो रहे हैं।

-प्रदेश की ब्यावरा विधानसभा एक ऐसी सीट है, जहां की जनता हर बार अपना प्रतिनिधि बदल देती है। 1993 से अब तक हर बार यहां नया विधायक ही चुना गया है। यदि कोई पार्टी उम्मीदवार रिपीट भी करती है, तो जनता उसे स्वीकार नहीं करती।

-इस बार विधायक का चुनाव लड़ रहे फूल सिंह बरैया, हरिवल्लभ शुक्ला, एंदल सिंह कंसाना, अजब सिंह कुशवाहा और राम प्रकाश राजौरिया ये कुछ ऐसे नेता हैं, जिन्हें घोषित दल-बदलू कह सकते हैं। हालांकि, इन नेताओं के लिए ये पहली बार नहीं है, इससे पहले भी ये तीन से चार बार दल बदल कर चुनाव लड़ चुके हैं।

-करैरा विधानसभा के एक दर्जन से अधिक ऐसे गांव हैं, जो रहते जिस जिले में हैं वहां वोट नहीं करते बल्कि दूसरे जिले के लोगों को वोट करते हैं. गांव दतिया जिले में आता है लेकिन उनकी विधानसभा करैरा शिवपुरी जिले के अंदर आती है।

-ग्वालियर पूर्व और नेपानगर ये दोनों ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जिसे लेकर मान्यता है कि, इस सीट पर जिस पार्टी का विधायक चुना जाता है, प्रदेश में उसी पार्टी के हाथ में सत्ता की कमान भी होती है।

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