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होठों पर चुम्बन लेना और शरीर के अंगों को छूना अननेचुरल सेक्स नहीं

मध्यप्रदेश में अननेचुरल सेक्स के कई मामले सामने आते हैं, कई मामले महिलाओं से जुड़े होते हैं, तो कई मामलों में नाबलिग और किशोरों के साथ भी घटनाएं होती है.

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भोपाल. मध्यप्रदेश में अननेचुरल सेक्स के कई मामले सामने आते हैं, कई मामले महिलाओं से जुड़े होते हैं, तो कई मामलों में नाबलिग और किशोरों के साथ भी घटनाएं होती है, एमपी में महज ५-७ साल के मासूमों के साथ भी अननेचुरल सेक्स की घटनाएं सामने आई है। अननेचुरल अपराध का एक मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में भी पहुंचा, जहां पीडि़त पक्ष द्वारा एक नाबालिग के साथ हुई घटना के चलते आरोपी के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम के तहत विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज करवाया था, इस मामले ने कोर्ट ने कहा कि होठों पर चुम्बन और शारीरिक अंगों को छूना अप्राकृतिक श्रेणी के अपराध में नहीं आता है।

जानिये क्या कहती है बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि होठों पर चुम्बन और शारीरिक अंगों को छूना भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत अप्राकृतिक श्रेणी का अपराध नहीं है। कोर्ट ने एक नाबालिग लड़के के यौन उत्पीडऩ के आरोपी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।

5 साल की हो सकती है सजा
जस्टिस अनुजा प्रभुदेसाई ने कहा, आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धाराओं में अधिकतम पांच साल की सजा हो सकती है। ऐसे में उसे जमानत पाने का अधिकार है। वर्तमान मामले में अप्राकृतिक सेक्स का मामला प्रथम दृष्टया प्रतीत नहीं होता। प्राथमिकी के मुताबिक 14 साल के लड़के के पिता को उनकी अलमारी से कुछ पैसे गायब मिले थे। पूछताछ में लड़के ने पिता को बताया कि उसने आरोपी को पैसे दिए हैं। वह मुंबई के एक उपनगर में आरोपी की दुकान पर ऑनलाइन गेम को रिचार्ज करने जाया करता था। लड़के ने आरोप लगाया कि एक दिन जब वह रिचार्ज कराने के लिए गया तो आरोपी ने उसके होठों पर चुम्बन ले लिया। इतना ही नहीं, उसने उसके अंगों को भी छू लिया। नाबालिग लड़के के पिता ने आरोपी के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम की संबंधित धाराओं और भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाई थी।

इस मामले में पुलिस ने जांच की और कोर्ट में चार्जशीट पेश की थी। इसके बाद कोर्ट में सुनवाई की गई। दोनों पक्षों के अपने पक्ष रखे। फिर कोर्ट ने आरोपी नाबालिग लड़के को जमानत दे दी।

जमानत के पक्ष में दिए तर्क

आइपीसी की धारा 377 में अधिकतम सजा आजीवन कारावास है। ऐसे में जमानत मुश्किल होती है, लेकिन कोर्ट ने आरोपी को जमानत देते हुए कहा, लड़के का मेडिकल परीक्षण उसके यौन उत्पीडऩ के आरोपों की पुष्टि नहीं करता। ऐसे में वह जमानत का हकदार है।