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हजारों साल से अंधेरा दूर करते आ रहे हैं दीपक, पुरानी है परंपरा

पुरातत्वविद् डॉ नारायण व्यास ने देश के कई हिस्सोंं से किया हैं इनका संग्रह, चित्रों के रूप में भी हैं संरक्षित  

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भोपाल

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Shakeel Khan

Nov 11, 2023

हजारों साल से अंधेरा दूर करते आ रहे हैं दीपक, पुरानी है परंपरा

हजारों साल से अंधेरा दूर करते आ रहे हैं दीपक, पुरानी है परंपरा

भोपाल. उजियारे के लिए कई तरह की लाइट्स भले ही रोशन की जाती है लेकिन दीयों बिना दिवाली अधूरी सी नजर आती है। रोशनी के लिए हजारों सालों से इनका उपयोग होता आ रहा है। भारत में दीयों की परम्परा हजारों साल पुरानी है। धर्मग्रंथों और इतिहास में दीये जलाने का उल्लेख मिलता है। दीये आटे और मिट्टी दोनों तरह के बनाए जाते थे।

शहर के वरिष्ठ पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास के यहां हजारों साल पुराने दीये संग्रहीत हैं। इनमें ईसा पूर्व दो हजार साल से लेकर आधुनिक काल के दीये शामिल हैं। दिवाली पर इन दीयों को रोशन कर हमारी सभ्यता, इतिहास और परम्पराओं को याद किया जाता है। वैसे तो चिराग तले अंधेरा कहावत बहुत पुरानी है, लेकिन यह भी सत्य है कि जब दो दीये साथ रखे जाते हैं तो उनके तले अंधेरा मिट जाता है। इसमें सहयोग की भावना निहित है।

डॉ व्यास ने बताया कि पुरातत्व महत्व की कई चीजों का संग्रह उनके पास है। उनमें से ये दिये भी शामिल हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से उन्होंने इन्हें जमा किया है। दिवाली पर इनमें कई ऐसे हैं जिनके उपयोग किया जाता है।

देश के कई हिस्सों में कर चुके हैं काम

डा.ॅ व्यास वरिष्ट पुरातत्वविद् हैं। देश के कई हिस्सों में काम कर चुके हैं। इसी दौरान कई अनोखी चीजें इन्हें मिली थी। महल, बावड़ी से लेकर एक पूरे शहर के अवशेष तक खोज के दौरान जुटाए जा चुके हैं। ये बताते हैं कि रामायण और महाभारत काल में दीयों के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान करने की भारतीय परम्परा पुरानी है। सांची के पास सम्राट अशोक के काल के कई चिन्ह हैं। उस दौर में जिन चीजों का प्रयोग होता था वे आज भी कई जगह मिट्टी में दबी हैं। नदी किनारे से कई जगह से हाथी दांत से बना हुआ सामान मिला। इनके कई चित्र इनके पास हैं।

ताम्रश्म काल में भी चलते थे दीपक

महेश्वर के पास नावदा टोली गांव में पुरातत्वविदों ने वर्ष १९५४-५५ में उत्खनन के दौरान लगभग बीस दीये पाए थे। इन दीयों को ताम्रश्म काल (करीब चार हजार वर्ष पूर्व) का माना गया है। वैसे तो धर्मगं्रथों व प्राचीन साहित्य में दीयों के प्रयोग का उल्लेख है, लेकिन पुरातत्व के लिहाज से ये दीये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह वर्ष १९७५ में विदिशा में उत्खनन के दौरान डॉ. व्यास को ४ दीये मिले थे, जो पहली-दूसरी शताब्दी के माने गए हैं। उत्खनन में एक जाली भी मिली थी, जिसमें दीये रखे जाते थे। इस जाली में रखने से दीये का प्रकाश चारों ओर फैलता है। यही नहीं, डॉ. व्यास के पास हिंदी के अजीम शायर दुष्यंत कुमार की बैठक का दीया और घड़ा संग्रहीत है। इसके अलावा भी कई चीजें मौजूद हैं।