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आसान नहीं विधान परिषद, केंद्र से मंजूरी के बाद ही गठन

- परिषद गठन के लिए दो अधिनियमों में केंद्र सरकार से कराना होगा संशोधन- विधि विभाग को दी कानूनी पहलुओं के अध्ययन की जिम्मेदारी

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भोपाल. कमलनाथ सरकार ने विधान परिषद के गठन के लिए प्रशासनिक कामकाज की शुरुआत मंगलवार को कर दी, लेकिन परिषद का गठन आसान नहीं है। क्योंकि इसके गठन के लिए राज्य सरकार को केंद्र सरकार से दो अधिनियमों में संशोधन कराना होगा, लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार है। इस कारण वहां से अधिनियम में संशोधन मुश्किल रहेगा। हालांकि राज्य सरकार ने विधि विभाग को कानूनी प्रक्रिया तय करने व सभी पहलुओं का परीक्षण करने की जिम्मेदारी दे दी है। मंत्रालय में मंगलवार को मुख्य सचिव एसआर मोहंती ने सभी संबंधित विभागों की बैठक ली। इसमें दूसरे राज्यों के परिषद गठन के नियमों और मध्यप्रदेश के परिषद गठन संबंधित नियमों का परीक्षण करना तय हुआ। मुख्य सचिव ने कहा है कि सभी संबंधित विभाग विधान परिषद पर अभिमत दें, जिससे इसे जल्द से जल्द कैबिनेट में लाया जा सके।

- इन दो कानूनों में करना होगा संशोधन
विधान परिषद गठन के लिए मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कराना होगा। दरअसल, मध्यप्रदेश में 1956 से ही परिषद गठन का प्रावधान है, लेकिन 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हो गया। इसके बाद मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ दो राज्य हो गए। अब पहले मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम में संशोधन करना होगा। यह दोनों संशोधन केंद्र सरकार से कराने होंगे। इसी तरह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में भी संशोधन की जरूरत है, क्योंकि इसमें भी पूर्व के नियम लागू हैं। इसका संशोधन भी केंद्र सरकार को करना होगा। ऐसी सूरत में मध्यप्रदेश केवल इतना ही कर सकता है कि यहां पर कैबिनेट और विधानसभा से प्रस्ताव को पारित करके केंद्र सरकार को भेज दें, लेकिन वहां से मंजूरी बिना परिषद का गठन नहीं हो सकता।

- विधि विभाग से पूछा क्या केंद्र के बगैर हो सकता है गठन
मुख्य सचिव ने विधि विभाग के प्रमुख सचिव सतेन्द्र कुमार सिंह से कहा कि इस संबंध में कानूनी पहलुओं का अध्ययन करके रिपोर्ट दें। इसमें यह देखा जाए कि क्या कोई ऐसा रास्ता भी हो सकता है कि बिना केंद्र की मंजूरी के भी परिषद का गठन किया जा सकता है। इन सभी पहलुओं को विधि विभाग देखकर राय देगा। इसके अलावा वित्त विभाग पूरे खर्च का आकलन करके रिपोर्ट देगा। इसमें वित्त बजट के इंतजाम से लेकर खर्च व अन्य पहलुओं पर अपनी रिपोर्ट देगा। इसके अलावा नगरीय व ग्रामीण विकास विभाग और मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी भी अपनी-अपनी रिपोर्ट सरकार को देंगे। इनमें परिषद गठन व क्रियान्वयन को लेकर विभिन्न पहलुओं के कानूनी व प्रशासनिक पहलू देखे जाएंगे।

- ऐसा है आकलन
प्रारंभिक आकलन के अनुसार परिषद सदस्य व अमले के वेतन-भत्तों पर सालाना 26.5 करोड़ रुपए खर्च होना है। इसके अलावा करीब सवा छह करोड़ खर्च पूंजीगत रहेगा। राज्य सरकार की मंशा 70 से 75 सदस्यों की परिषद गठित करने की है। परिषद में विधानसभा से एक तिहाई सदस्य ही हो सकते हैं। इसके अध्यक्ष व उपाध्यक्ष भी अलग होंगे। इनके और परिषद सदस्यों के वेतन-भत्ते व दर्जा विधानसभा सदस्यों के बराबर होगा।

कमलनाथ सरकार का न तो कोई विजन है न भविष्य। सरकार कैसे बची रहे सारे प्रयास उसी के इर्द-गिर्द है। विधान परिषद का शिगूफा सिर्फ अपने लोगों को उपकृत करने के लिए हैं। विधान परिषद से ऐसे कौन-से काम शुरू हो जाएंगे जो करने में इनको अभी कठिनाई आ रही है।
राकेश ङ्क्षसह, अध्यक्ष, प्रदेश भाजपा